Utpatti Prakarana (Creation) · Sarga 49
अड़तालीसवाँ सर्ग समाप्त उनचासवांँ सर्ग पर्वतास्त्र, वज़ास्त्र, ब्रह्मास्त्र ओर पिशाचास्त्र का, जिसमें पिशाचों की विविध लीलाएँ थी, विस्तार से वर्णन।
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- Verse 1श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामचन्द्रजी, तुषार से सने हुए वायु बहने लगे, उन्होनें वन क…
- Verses 2–3उक्त वायुओं ने वृक्षों के झुण्डके झुण्ड को पक्षियों की नाई आकाश में उड़ा दिया, बड़े-बड़े…
- Verse 4तदुपरान्त महास्त्रवेत्ता राजा विदूरथ ने पर्वतास्त्र का त्याग किया, वह मानों मेघ-जल के साथ…
- Verse 5उस पर्वतास्त्र के प्रहार से सर्वत्र व्याप्त वायु ऐसे शान्ति को प्राप्त हुआ जैसे कि तत्त्व…
- Verse 6जैसे अनेक लोगों के शवों के ढेर में करोड़ों कौए गिरते हैं, वैसे की पहले वायु के कारण आकाश…
- Verse 7दिशाओं के सूत्कार (निःश्वास के शब्द), डात्कार (लूटपाट के शब्द), भांकार (भीषण शब्द) और उत्…
- Verse 8जैसे सागर ने प्राचीन कालमें अपने ऊपर इधर-उधर उड़ते हुए पंखवाले मैनाक आदि पर्वतों को देखा…
- Verse 9तदुपरान्त राजा सिन्धु ने दीप्त वज़ास्त्र की सृष्टि की उससे जैसे अग्नि लकड़ियों को जला डाल…
- Verse 10उन्होंने (वस्नो ने) अपने करोड़ों मुखो द्वारा कर्तन से (काटने से) पर्वतों के शिखरों को ऐसे…
- Verse 11तदनन्तर राजा विदूरथ ने वज़ास्त्र की शान्ति के लिए अन्यान्य अस्त्रों का अतिक्रमण कर ब्रह्म…
- Verses 12–20की पंक्तियों की पंक्तिर्यौ निकली । उन पिशाचो की पंक्तियों से जैसे सन्ध्या के समय कोई आदमी…
- Verse 21राजा सिन्धु की पिशाचसेना जब राजा विदूरथ के ऊपर आक्रमण करना चाहती थी, तभी राजा विदूरथ ने,…
- Verse 22राजा विदूरथ पिशाचो से संग्राम करने की माया को जानता था, उस माया द्वारा उसने पिशाचो की उस…
- Verse 23तदनन्तर राजा विदूरथ के अपने सैनिक तो स्वस्थ हो गये ओर शत्रु के सैनिक पिशाचो से आविष्ट होक…
- Verses 24–26खड़े हुए केशवाली गड्ढे से घुरी हुई विकराल नेत्रवाली तथा चंचल कटिभाग ओर स्तनमण्डल से युक्त…
- Verses 27–28वे पिशाचियाँ विविध प्रकार की अंगचेष्टाएँ कर रही थी, वे भाँति-भाँति के अनम्र लोगों को नवान…
- Verse 29उन्होंने उन दुर्बल पिशाचोंको दुष्ट बच्चों की नाईं पतिरूप से पकड़ लिया, तदुपरान्त रूपिकाओं…
- Verses 30–31वे क्रीड़ारस में अत्यन्त मग्न, नाचने के कारण उठाने मुँह, अंग और नयनवाले थे, परस्पर एक दूस…
- Verses 32–33वे रुधिररूपी जलमें बार-बार डूबकर ऊपर को उबरते थे, उनके शरीर बह रहे खून से लथपथ अतएव दैदीप…
- Verse 34जैसे ही पहले राजा विदूरथ ने राजा सिन्धु की माया का संचार (उसकी माया को लौटाकर उसी के ऊपर…
- Verses 35–36तदुपरान्त पिशाचास्त्र से उत्पन्न पिशाच और रूपिकाओं की सेना की सहायता के लिए राजा सिन्धु न…
- Verses 37–40तदनन्तर पिशाच, वेताल, रूपिका ओर भीषण कबन्धों से परिपूर्ण वह भीषण सेना पृथिवी को निगलने मे…
- Verse 41कूष्माण्डों के उद्धतनृत्य में दण्डपाद से (पैरों को इधर उधर नचाने के एक प्रकार से) विक्षुब…