Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 49, Verses 30–31
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 49, verses 30–31 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 49 · श्लोक 30,31
संस्कृत श्लोक
निर्मग्ननर्तनोत्तानवदनाङ्गविलोचनम् ।
परस्पराक्रान्तिकरं प्रधावच्च परस्परम् ॥ ३० ॥
निष्कासितमहाजिह्व नानामुखविकारदम् ।
शरभाराढ्यमन्योन्यं ह्रियमाणशवाङ्गकम् ॥ ३१ ॥
हिन्दी अर्थ
वे क्रीड़ारस में अत्यन्त मग्न, नाचने के कारण उठाने मुँह, अंग और
नयनवाले थे, परस्पर एक दूसरे के ऊपर आक्रमण कर रहे थे तथा परस्पर दौड़ रहे थे।
उन्होंने बड़ी जिह्वा बाहर निकाल रक्खी थी, नाना प्रकार के मुँह के विकारसे युक्त थे, रुधिरमुण्ड
के भार से वे आक्रान्त थे, परस्पर एक दूसरे की प्रसन्नता के लिए वे शवों को ले जा रहे
थे