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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 49, Verses 27–28

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 49, verses 27–28 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 49 · श्लोक 27, 28

संस्कृत श्लोक

नानाङ्गवलना नानानमन्नमनसत्तमाः । शिलाभुजगवक्रोरुकटिपार्श्वकराङ्गिकाः ॥ २७ ॥ नारीकृतार्भकशवा हस्ताकृष्टान्त्ररज्जवः । श्वकाकोलूकवदना निम्नवक्त्रहनूदराः ॥ २८ ॥

हिन्दी अर्थ

वे पिशाचियाँ विविध प्रकार की अंगचेष्टाएँ कर रही थी, वे भाँति-भाँति के अनम्र लोगों को नवाने में समर्थ थी और उनके मुंह, जंघा, कमर, पसली, भुजाएँ ओर अन्यान्य अंग शिलाओं की नाई कठोर ओर साँपों की नाई टेढ़े मेढे थे। उन्होंने बच्चोंके शवों की नरमाला पहन रक्खी थी, हाथ से वे मनुष्यों की आँत रूपी रस्सी को खींचती थी, उनमें से किसी का मुँह कुत्ते जैसा किसी का कोए जैसा और किसी का उल्लू जैसा था | उनके मुँह, चिबुक (ठोड़ी) पेट गहरे थे