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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 49, Verses 12–20

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 49, verses 12–20 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 49 · श्लोक 12-20

संस्कृत श्लोक

श्यामाश्यामं पिशाचास्त्रमथ सिन्धुरचोदयत् । तेनोदगुः पिशाचानां पङ्क्तयोऽत्यन्तभीतिदाः ॥ १२ ॥ संध्यायामथ भीत्येव दिवसः श्यामतां ययौ । पिशाचा भुवनं जग्मुरन्धकारभरा इव ॥ १३ ॥ भस्मनः स्तम्भसदृशास्तालोत्तालविलासिनः । दृश्यमानमहाकारा मुष्टिग्राह्या न किंचन ॥ १४ ॥ ऊर्ध्वकेशाः कृशाङ्गाश्च केचिच्च श्मश्रुला अपि । कृष्णाङ्गा मलिनाङ्गाश्च ग्राम्या इव नभश्चराः ॥ १५ ॥ सभया मूढदृष्टाश्च यत्किंचनकराश्चलाः । दीना वज्रासिनः क्रूरा दीना ग्राम्यजना इव ॥ १६ ॥ तरुकर्दमरथ्यान्तः शून्यगेहगृहाश्चलाः । लेलिहानाः प्रेतरूपा कृष्णाङ्गाश्चपला इव ॥ १७ ॥ जगृहुस्ते तदा मत्ता हतशिष्टमरेर्बलम् । आसंस्तत्सैनिकास्तत्र भिन्नास्त्रक्षुब्धचेतनाः ॥ १८ ॥ त्यक्तायुधतनुत्राणास्त्रस्तप्राणाः स्खलद्गमाः । नेत्रैरङ्गेर्मुखैः पादैर्विकारभरकारिणः ॥ १९ ॥ त्यक्तकौपीनवसना निमग्नावसनोत्तराः । विष्ठां मूत्रं च कुर्वन्तः स्थिरमारब्धनर्तनाः ॥ २० ॥

हिन्दी अर्थ

की पंक्तियों की पंक्तिर्यौ निकली । उन पिशाचो की पंक्तियों से जैसे सन्ध्या के समय कोई आदमी भयभीत हो काला हो जाता हे, वैसे ही दिन भी भय से मानों काला हो गया । अन्धकार के समूह की तरह पिशाच भुवन में व्याप्त हुए । उनमें से कोई भस्म के (जले हुए) स्तम्भो के तुल्य काले थे, कोई ताड के पेड के सदुश ऊँचे थे, किन्हीं का कोई रूप ही न था यानी अदृश्य थे । किन्हीं के केश ऊपर को खड़े थे, कोई बडे दुबले पतले थे, कोई मूछ-दाढीवाले थे, कोई काले थे, किन्हीं का शरीर ग्रामीण पुरुषों की नाई बडा गन्दा था, कोई आकाशचारी थे, कोई केवल अपवित्र लोगों के दृष्टिगोचर होते थे, किन्हीके हाथ में हड्डी, नर-मुण्ड आदि वस्तुएँ थी, कोई चंचल थे, कोई दीन-हीन थे, कोई वज्र ओर तलवार से भी बढ़कर क्रूर थे, कोई ग्रामीण दरिद्रो की नाई दीन-हीन थे, वृक्ष, कीचड़, रथ्या (जलप्रवाह) के भीतर ओर शून्य घर मेँ उनका निवास था ओर वे बड़े चंचल थे । उनमें से कोई अपनी जिह्वा ओं को लपलपा रहे थे, किन्हीं का स्वरूप प्रेतो के तुल्य था, किन्हीं का अंग काला था, कोई बिजली के तुल्य स्वरूपवाले थे यानी कभी दिखाई देते थे ओर कभी छिप जाते थे। मदोन्मत्त उन लोगों ने मरने से बचे हुए शत्रु के सैनिकों को पकड़ना आरम्भ किया । वहाँ पर उसके सैनिकों की बुरी हालत हुई । किन्हीं के अस्त्र-शस्त्र, छिन्न -भिन्न हो गये थे और किन्हीं की चेतना शक्ति नष्ट हो गयी थी, किन्हींके हथियार कवच अलग हो गये थे, कोई मारे भय के दुबके हुए थे ओर कोई बारवार ठोकर खाकर चल रहे थे | वे सब नयन, मुख, पैर ओर अन्यान्य अंगों से भाँति भाँति की भूताविष्ट-चेष्टाएँ कर रहे थे । उनमें से कुछ ने कौपीन ओर वस्त्रों का त्याग कर दिया था, कुछ के ऊपर के और नीचे के वस्त्रहीन अंग संकुचित थे, कुछ खड़े होकर मलमूत्र का त्याग कर रहे थे ओर कुछ ने नाचना आरम्भ कर दिया था