Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 49, Verses 32–33
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 49, verses 32–33 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 49 · श्लोक 32, 33
संस्कृत श्लोक
रुधिराम्भसि मज्जं तदुन्मज्जद्धृल्लसत्तनु ।
लम्बोदरं लम्बभुजं लम्बकर्णोष्ठनासिकम् ॥ ३२ ॥
रक्तमांसमहापङ्केष्वन्योन्यं वेल्लनाभ्यसत् ।
मन्दरोद्धूतदुग्धाब्धिलसत्कलकलाकुलम् ॥ ३३ ॥
हिन्दी अर्थ
वे रुधिररूपी जलमें बार-बार डूबकर ऊपर को उबरते थे, उनके शरीर बह
रहे खून से लथपथ अतएव दैदीप्यमान थे, पेट, भुजाएँ, कान, ओठ और नासिका- ये अंग
बड़े लम्बे थे। रुधिर और मोस के कीचड़ में वे परस्पर लोट-पोट कर रहे थे और मन्दराचलसे
मथे जा रहे क्षीरसागरके से विपुल कोलाहल से वे व्याप्त थे