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Utpatti Prakarana (Creation) · Sarga 45

चौवालीसवाँ सर्ग समाप्त प्ैंतालीसवाँ सर्ग॑ लीला को दूसरे वररूप राजा पद्म की प्राप्ति तथा जीवों को अपने-अपने संकल्पो के अनुसार फल-प्राप्ति का वर्णन |

14 verse-groups

  1. Verse 1श्रीसरस्वतीजी ने कहा : भद्रे, तुम्हारा पति यह विदूरथ रणभूमि में देह का त्याग कर उसी अन्तः…
  2. Verses 2–4श्रीदेवी का यह वचन सुन कर देवी के सामने बैठी हुई उस नगर में रहनेवाली लीला ने नम्रतापूर्वक…
  3. Verses 5–7श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स, द्वितीय लीला के यों कहने पर देवी सरस्वलीजी ने उसके भक्तिभाव स…
  4. Verse 8श्रीदेवीजी ने कहा : हे पुत्री, तुमने चिरकालतक अनन्यभक्त से प्रचुर पुष्प-धूप-दीप-युक्त पूज…
  5. Verses 9–11श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स, तदनन्तर उस वर के लाभ से उस देश में रहनेवाली लीला के सन्तोष से…
  6. Verse 12मुझमें स्वतः कोई कामना नहीं है, क्योकि मैं पूर्णकाम हूँ । प्राणियों के कर्म के अनुसार होन…
  7. Verse 13संविन्मात्र की अधिष्ठात्री देवी मैं सरस्वती प्राणियों के भावी शुभ फल को वरदान द्वारा प्रक…
  8. Verses 14–15उसीके अनुसार ही मैं फल देती हूँ, ऐसा कहती है । जिस जिस जीव की जो शक्ति जैसे जैसे उदित होत…
  9. Verse 16भद्रे, पूर्वोक्तिभिन्न प्रकार से मेरे द्वारा प्रबोधित हुई तुम उक्त युक्ति से बोध द्वारा ज…
  10. Verse 17“मेँ मुक्त होऊँ” इस प्रकार की भावना से चिरकाल तक युक्त तुम इस पूर्वप्रदर्शित युक्ति द्वार…
  11. Verse 18जिस-जिस का पुरुषप्रयत्न चिरकाल तक जैसा उदित होता है, वह समय पाकर उस उस को वैसा-वैसा फल दे…
  12. Verse 19अपनी चित्‌-शक्ति ही तपस्या बन कर या देवता का रूप धारण कर स्वेच्छा से आकाश से फल गिरने की…
  13. Verse 20स्वसंवित्‌ (जीवशक्ति) प्रयत्न के विना कभी कुछ भी फल नहीं दे सकती, इसलिए तुम जैसा फल चाहती…
  14. Verses 21–22यह निश्चित है कि सर्वान्तियमिी चिद्‌भाव (चित्‌सत्ता) ही पहले रम्य यानी शारत्रविहित अथवा अ…