Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 45, Verse 12
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 45, verse 12 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 45 · श्लोक 12
संस्कृत श्लोक
श्रीदेव्युवाच ।
न किंचित्कस्यचिदहं करोमि वरवर्णिनि ।
सर्व संपादयत्याशु स्वयं जीवः स्वमीहितम् ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
मुझमें स्वतः कोई कामना नहीं है, क्योकि मैं पूर्णकाम हूँ । प्राणियों के कर्म के अनुसार
होनेवाली मेरी कामना प्राणियों के कर्मो से ही व्यवस्थित है, इस आशयसे देवी लीला की शंका
का समाधान करती है ।
श्रीदेवीजी ने कहा : भद्रे, मेँ किसी का कुछ भी नहीं करती, जीव स्वयं अपने सम्पूर्ण
ईच्छित पदार्थो को शीघ्र सम्पादित करता हे