Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 45, Verses 5–7

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 45, verses 5–7 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 45 · श्लोक 5-7

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । इत्युक्ता सा तदा ज्ञप्तिः स्मृत्वा तद्भक्तिभावनम् । इदं प्रसन्ना प्रोवाच तां लीलां तत्पुरास्पदाम् ॥ ५ ॥ श्रीदेव्युवाच । अनन्यया भावनया यावज्जीवमजीर्णया । परितुष्टास्मि ते वत्से गृहाणाभिमतं वरम् ॥ ६ ॥ तद्देशलीलोवाच । रणाद्देहं परित्यज्य यत्र तिष्ठति मे पतिः । अनेनैव शरीरेण तत्र स्यामेतदङ्गना ॥ ७ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स, द्वितीय लीला के यों कहने पर देवी सरस्वलीजी ने उसके भक्तिभाव से किये गये ध्यान और पूजन का स्मरण कर, प्रसन्न होकर उस नगर में रहनेवाली लीला से यह कहा : भद्रे, तुम्हारी जीवनभर की अनन्यभक्ति से, जो कभी भी विच्छिन्न नहीं हुई, मैं तुमसे सन्तुष्ट हूँ, तुम्हें जो इच्छा हो, वह वरदान मुझसे माँगो । उस प्रदेश में रहने वाली लीला ने कहा : हे देवि रणभूमि से देह का परित्याग कर जहाँ पर मेरे पति रहेंगे, मैं इसी देह से वहाँ पर उनकी पत्नी होऊँ