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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 45, Verse 13

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 45, verse 13 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 45 · श्लोक 13

संस्कृत श्लोक

अहं हितं रटे ज्ञप्तिः संविन्मात्राधिदेवता । प्रत्येकमस्ति चिच्छक्तिर्जीवशक्तिस्वरूपिणी ॥ १३ ॥

हिन्दी अर्थ

संविन्मात्र की अधिष्ठात्री देवी मैं सरस्वती प्राणियों के भावी शुभ फल को वरदान द्वारा प्रकाशित करती हू । प्रत्येक जीव में पूर्वजन्म के काम, कर्म ओर वासना से अवच्छिन्न चिदात्मरूप जीवशक्ति- स्वरूपिणी तत्‌-तत्‌ कार्य की बीजभूत माया से संवलित जो चित्‌-शक्ति है, वही फल का उत्पादन करती है