Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 45, Verse 17
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 45, verse 17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 45 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
अनयैव भावनया बोधितासि चिरं तदा ।
तमेवाऽर्थं प्राप्तवती सदा स्वचितिशक्तितः ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
“मेँ मुक्त होऊँ” इस प्रकार की भावना से
चिरकाल तक युक्त तुम इस पूर्वप्रदर्शित युक्ति द्वारा मुझसे प्रबोधित हुई हो, अपनी चितिशक्ति
के प्रभाव से उस यानी सदा भावित अर्थ को ही प्राप्त हुई हो