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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 45, Verses 2–4

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 45, verses 2–4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 45 · श्लोक 2-4

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । इत्याकर्ण्य वचो देव्या लीला सा तत्पुरास्पदा । पुरः प्रह्वा स्थितोवाच वचनं विहिताञ्जलिः ॥ २ ॥ द्वितीयलीलोवाच । देवी भगवती ज्ञप्तिर्नित्यमेवार्चिता मया । स्वप्ने संदर्शनं देवी सा ददाति निशासु मे ॥ ३ ॥ सा यादृश्येव देवेशि तादृश्येव त्वमम्बिके । तन्मे कृपणकारुण्याद्वरं देहि वरानने ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीदेवी का यह वचन सुन कर देवी के सामने बैठी हुई उस नगर में रहनेवाली लीला ने नम्रतापूर्वक हाथ जोड़ कर देवी से कहा : भगवती सरस्वती देवी की मैंने नित्य ही पूजा परिचर्या की है । सरस्वती देवी जब तब सदा रात में मुझे स्वप्न में दर्शन देती हे । हे देवी, जैसी वह है, ठीक वैसी ही आप है, अतः मालूम होता है कि वही आप हैं । इसलिए हे वरानने, दीन के ऊपर दया करके मुझे आप वर प्रदान कीजिये