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Utpatti Prakarana (Creation) · Sarga 35

चौंतीसवाँ सर्ग समाप्त पैंतीसवाँ सर्ग॑ समुद्र, वन, प्रलय आदि विविधरूपकों से चतुरंगिणी सेना के संग्राम का विस्तार से वर्णन ।

12 verse-groups

  1. Verse 1पहले समुद्र के रूपक से संग्राम का वर्णन करने के लिए वस़्रिष्ठजी कहते हैं। श्रीवसिष्ठजी ने…
  2. Verses 2–4उक्त रणसागर में इधर-उधर बिखरे हुए छातेरूपी समुद्रफेन में अटके हुए सफेद बाणरूपी छोटी-छोटी…
  3. Verse 5मकराकार व्यूहों के (एक प्रकार के सेना संनिवेशो के) विस्तार से योद्धासमुदायरूपी नौकाएँ भग्…
  4. Verses 6–8जैसे सागर में मछलियों के समूहों से उत्पन्न हुए सर के (काश के) बीजों के ढेर की नाई सरसों क…
  5. Verses 9–10बाणरूपी जलकणों के कुहरे से दसों दिशाएँ अन्धकार पूर्ण थी, उस रणसागरने अपने निर्घोष से सम्प…
  6. Verse 11क्लेशकारक टंकारवाले धनुषरूपी सर्पो के छेदन में योद्धा तत्पर थे, निशंक होकर पाताल से मानों…
  7. Verse 12गमन और आगमन में तत्पर अनन्त पताका और छत्र ही उसमें फेन थे, बह रही रुधिर की नदी के वेग में…
  8. Verse 13रुधिर के बड़े-बड़े बुद्बुद्‌ ५ जैसे सागर के जल को मेघ पी डालते है, वैसे ही वहाँ पर धूलिपट…
  9. Verses 14–25वह रणसागर संग्रामयुक्त अम्बरग्राम के (गन्धर्वनगर के) सदृश मनुष्यों के लिए बड़ा आश्चर्यकार…
  10. Verse 26सेनिकरूपी मेघो ने निबिड बाणवृष्टिरूपी वर्षा से महीतल ओर आकाशमण्डल को आच्छन्न कर दिया था,…
  11. Verse 27जैसे उग्र झंझावात से उड़ाये गये जल के साँपों से समूद्र के गर्भ में स्थित पर्वत व्याप्त हो…
  12. Verse 28परस्पर एक दूसरे को काटने से शब्द कर रहे ओर झुण्ड के साथ दसों दिशाओं में घूम रहे देदीप्यमा…