Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 35, Verses 14–25
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 35, verses 14–25 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 35 · श्लोक 14-25
संस्कृत श्लोक
ससंग्रामोऽम्बरग्राम इवाश्चर्यकरो नृणाम् ।
अभूत्प्रलयभूकम्पकम्पिताचलचञ्चलः ॥ १४ ॥
तरत्तरङ्गविहगः पतत्करिघटातटः ।
त्रस्तभीरुमृगानीकस्कूर्जद्धुरुघुरारवः ॥ १५ ॥
सरच्छरालीशलभशतभङ्गुरसैनिकः ।
तरत्तरङ्गशरभः शरभारवनावनिः ॥ १६ ॥
चलद्द्विरेफनिर्ह्रादो रसत्तूर्यगुहागुरुः ।
चिरात्स सैन्यजलदो लुठद्भटमृगाधिपः ॥ १७ ॥
प्रसरद्धूलिजलदो विगलत्सैन्यसानुमान् ।
पतद्रथवराढ्याङ्गः प्रतपत्खङ्गमण्डलः ॥ १८ ॥
प्रोत्पतत्पदपुष्पौघः पताकाच्छत्रवारिदः ।
वहद्रक्तनदीपूरपतत्साराववारणः ॥ १९ ॥
सोऽभूत्समरकल्पान्तो जगत्कवलनाकुलः ।
पर्यस्तसध्वजच्छत्रपताकारथपत्तनः ॥ २० ॥
पतद्विमलहेत्यौघभूरिभास्वरभास्करः ।
कठिनप्राणसंतापतापिताखिलमानसः ॥ २१ ॥
कोदण्डपुष्करावर्तशरधारानिरन्तरः ।
वहत्खंगशिलालेखाविद्युद्वलयिताम्बरः ॥ २२ ॥
उच्छिन्नरक्तजलधिपतितेभकुलाचलः ।
नभोविकीर्णनिपतद्युत्तारकणतारकः ॥ २३ ॥
चक्रकुल्याम्बुदावर्तपूर्णव्योमशिराम्बुदः ।
अस्त्रकल्पाग्निनिर्दग्धसैन्यलोकान्तरक्रमः ॥ २४ ॥
हेतिवर्षाशनिच्छन्नभूतलामलभूधरः ।
गजराजगिरिव्रातपातपिष्टजनव्रजः ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
वह रणसागर संग्रामयुक्त अम्बरग्राम के (गन्धर्वनगर के) सदृश
मनुष्यों के लिए बड़ा आश्चर्यकारी हुआ । वह संग्राम क्या थे, एक प्रकार का प्रलय ही था,
प्रलयकाल के भूकम्प से कँपाये गये पर्वतो के सदुश चंचल था, उसमें पक्षी तैरती तरंगों के
समान थे, गजघटारूपी तट गिर रहे थे भयभीत हरिण रूपी सेना का घुघुर शब्द
प्रलयकालीन वज़निर्घोष के तुल्य था, इधर से उधर सरसराते बाणों की पंक्ति से सैकड़ों
शलभों के (पतंगों के) समान सैनिक गिर रहे थे, दौड़ते हुए घोड़े ही जिसमें मृग थे, बाणों
के संघात ही अथवा बाणधारी योद्धा ही उसमें वनपूर्ण भूमि थी, उसमें चल रहे सैनिकरूपी
भ्रमरों का गुंजार हो रहा था, बज रहीं तुरहीरूप गुहाओं से उसका विस्तार कहीं अधिक बढ़ा
चढ़ा था, सेनायुक्त गज आदि ही उसमें मेघ थे, लुढ़क रहे योद्धा ही उसमें सिंह थे,
चतुरंगिणी सेना के संचार से उड़ी हुई धूलि मेघरूप में परिणत हो गई थी, सैनिकरूपी पर्वत
उसमें गल रहे थे, महारथों के अवयव चूरचूर होकर गिर रहे थे, तलवारें अपना प्रताप दिखा
रही थी, पदचिहरूपी फूलों की राशियाँ उड़ रही थी, पताकाओं और छातों ने मेघों का रूप
धारण कर रक्खा था, हाथी बह रही रुधिर की नदी के प्रवाह में गिरने के कारण चिंघाड़
रहे थे, इस प्रकार का वह समररूपी प्रलय जगत को निगलने में बड़ी तत्परता से प्रवृत
हुआ। उसमें ध्वजाओं, छत्रो ओर पताकाओं से युक्त रथरूपी नगर इधर-उधर अस्त-
व्यस्त हो रहे थे, वीरों के ऊपर गिर रहे अस्त्र-शस्त्रों के समूहरूपी अनेक देदीप्यमान सूर्य
तप रहे थे, घोर प्राणपीड़ा से सब लोगों के मन सन्तप्त हो रहे थे, वीरों के धनुषरूपी
पुष्करावर्तो (प्रलयकाल के मेघों) से निकली हुई बाणवृष्टिरूपी मूसलाधार वृष्टि से वह
चारों ओर व्याप्त था, चमचमा रहीं तलवारों की सान में तीखी की गई धाररूपी बिजली से
सारा आकाश परिवेष्टित था, उसमें कटे लोगों के शरीरों से निकले हुए रुधिर के समुद्र में
हाथी रूपी पर्वत डूब गये थे । आकाश में फैले हुए नीचे गिर रहे अन्य रुधिरबिन्दुओं से
मिलकर स्थूल हुए (रूधिरबिन्दु) ही उसमें तारे थे, अनेक चक्रों की परम्परारूपी छोटी
नदियों से, जो कि मेघप्रदेश में घूमने पर प्रचुर भौरीवाली प्रतीत होती थी, आकाशमण्डल
ओर मेघ भरे थे, वहाँ अस्त्रशस्त्ररूप प्रलयाग्नि से जले हुए सेनिक परलोकगमन कर रहे थे,
शस्त्रास्त्रों की वृष्टिरूपी वज्र से भूतलरूपी निर्मल पर्वत आच्छन्न थे, उसमें गजराजरूपी
पर्वतो की राशियों के गिरने से जनसमूह चूर-चूर हो गया था