Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 35, Verses 2–4
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 35, verses 2–4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 35 · श्लोक 2-4
संस्कृत श्लोक
छत्रडिण्डीरविश्रान्तसितेषुशफरोत्करः ।
अश्वसैन्योल्लसल्लोलकल्लोलाकुलकोटरः ॥ २ ॥
नानायुधनदीनीतसैन्यावर्तविवृत्तिमान् ।
मत्तहस्तिघटापीठचलाचलकुलाचलः ॥ ३ ॥
कचच्चक्रशतावर्तवृत्तिभ्रान्तशिरस्तृणः ।
धूलीजलधरापीतभ्रमत्खड्गप्रभाजलः ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
उक्त रणसागर में इधर-उधर बिखरे हुए छातेरूपी समुद्रफेन
में अटके हुए सफेद बाणरूपी छोटी-छोटी मछलियों के समूह थे, घुड़सवार सैनिक रूपी
उछल रही चंचल कल्लोलोँसे (बड़ी लहरों से) उसके कोटरों में हलचल मची थी, भाँति-
भाँति के अस्त्रशस्त्ररूपी नदियों में बने हुए सैनिकरूपी आवर्त (जलभौंरी) उसमें भ्रमण कर
रहे थे, उसमें मदोन्मत्त हाथियों के दलरूपी आमूल चंचल मन्दराचल थे, चमचमा रहे
सैकड़ों चक्ररूपी आवर्तों के भ्रमण से उनसे (चक्रों से) काटे गये सिररूपी तिनके उसमें घूम
रहे थे, धूलिरूपी बादलोंने उक्त रणसमुद्रमें चल रही तलवारों की प्रभारूपी जल को पी
डाला था (४४)