Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 35, Verse 5
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 35, verse 5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 35 · श्लोक 5
संस्कृत श्लोक
मकरव्यूहविस्तारभग्नाभग्नभटौघनौ ।
महागुडुगुडावर्तप्रतिश्रुद्धनकन्दरः ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
मकराकार व्यूहों के (एक प्रकार के सेना संनिवेशो के) विस्तार
से योद्धासमुदायरूपी नौकाएँ भग्न और अभग्न थी, जैसे जल-सागर में बड़े विशाल मगरों
के कारण कुछ नौकाएँ नष्ट और कुछ अनष्ट रहती हैं, वैसे ही उक्त रणसागर में मकराकार
सेना व्यूह के विस्तार से कुछ योद्धा भग्न थे और कुछ अभग्न थे। बड़ी भारी गड़गड़ाहट
करनेवाले रथादिरूपी आवर्त के शब्द से उक्त रणसागर में बड़ी बड़ी पर्वतों की कन्दराएँ
प्रतिध्वनित हो रही थी