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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 35, Verses 9–10

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 35, verses 9–10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 35 · श्लोक 9,10

संस्कृत श्लोक

शरसीकरनीहारसान्धकारककुब्गणः । निर्घोषाशोषिताशेषशब्दैकघनघुंघुमः ॥ ९ ॥ पतनोत्पतनव्यग्रशिरःशकलसीकरः । आवर्तचक्रव्यूहेषु प्रभ्रमद्भटकाष्ठकः ॥ १० ॥

हिन्दी अर्थ

बाणरूपी जलकणों के कुहरे से दसों दिशाएँ अन्धकार पूर्ण थी, उस रणसागरने अपने निर्घोष से सम्पूर्ण शब्दों को असंवेद्य कर दिया था, अतएव उसमें एकमात्र निबिड घुंघुम शब्द होता था । गिरने और उछलने से व्यग्र सिरों के खण्ड ही उसमें जलकण थे, आवर्तरूपी चक्रों के समूहों में योद्धारूपी काष्ठ घूम रहे थे