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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 35, Verse 13

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 35, verse 13 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 35 · श्लोक 13

संस्कृत श्लोक

गजप्रतिमसंपन्नमहारुधिरबुद्बुदः । सैन्यप्रवाहविचलद्धयहस्तिजलेचरः ॥ १३ ॥

हिन्दी अर्थ

रुधिर के बड़े-बड़े बुद्बुद्‌ ५ जैसे सागर के जल को मेघ पी डालते है, वैसे ही वहाँ पर धूलिपटल ने घूम रही तलवारों की प्रभा को पी डाला था, यानी छिपा दिया था । यहाँ पर आच्छादन की नीलरूप से कल्पना की गई है। & अस्ति मत्स्यस्तमिर्नाम शतयोजनविस्तृतः । भरतध्यृतवाक्य । अस्ति मत्स्यस्तिमिर्नाम तथा चास्ति तिमिंगलः | तिमिगिनिलोऽप्यस्ति तद्विलोऽप्यस्ति राधवः ॥ रामायणवाक्य । (यानी तिमि नाम की मछली सौ योजन की है, उसको निगलनेवाली मछली का नाम तिमिंगिल है और तिमिंगिल को निगलनेवाली मछली भी है, जो राधव कहलाती है |) हाथी के सदुश हो गये थे, सेनारूपी प्रवाह में हाथी-घोड़े-रूपी जल-जन्तु वहाँ इधर- उधर चल रहे थे