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Utpatti Prakarana (Creation) · Sarga 107

एक सौ छठा सर्ग समाप्त एक सौ सातवाँ सर्ग वहाँ पर पूरे साठ वर्ष तक निवास करते हुए राजा का चण्डालोचित कार्य से जीवनयापन वर्णन |

20 verse-groups

  1. Verse 1राजा ने कहा : हे सभासदों, इस विषय में मैं बहुत क्या कहूँ विविध उत्सवों से युक्त विवाह से…
  2. Verses 2–7विविध यातनाओं को बिताता हे वैसे ही उसके साथ वहाँ पर मैंने बहुत वर्ष बिताये । जैसे बूढ़ा क…
  3. Verse 8कुटुम्ब के पालन की चिन्ता से नष्ट हुई अतएव जल रही बुद्धि से मैंने जलती हुई दिशाओं के समान…
  4. Verse 9तीसी की छाल से बने हुए अनेक वर्षो से काम में लाने के कारण जीर्ण-शीर्ण वस्त्र के ऊपर पिण्ड…
  5. Verse 10जुँओं से भरे हुए, जीर्णशीर्ण, पसीने से तर अतएव दुर्गन्ध से युक्त कोपीनमात्र ही मेरा एकमात…
  6. Verses 11–12जैसे हेमन्त ऋतु में मेढक वन के मध्य में छिप जाता है वैसे ही जाड़ा ओर शीतवायु से जर्जरित ओ…
  7. Verse 13भीगे हुए जंगल में पाषाणो की गुफारूपी कुटियों में मेघ से भीषण वे रात्रियाँ बीती जिनमें एकम…
  8. Verses 14–15काले मेघों से निबिड़ता को प्राप्त हुए सब बीजों को अंकुरित करनेवाले वर्षाकाल के बन्धुओं के…
  9. Verse 16चण्डाली के कलह से दुःखी हुए अतएव क्रुद्ध चण्डालों के अत्यन्त तर्जन-भर्त्सन से मेरा मुख ऐस…
  10. Verse 17नारकी पुरुषों से लाई गई और नारकी पुरूषों के हाथ भेजी गई नरक की अँतड़ियों की नाईं बाघ की म…
  11. Verses 18–23हिमालय की कन्दराओं से निकली हुई बड़ी भयंकर हेमन्त की लहरों, शिशिर में जलकणों की तेज वृष्ट…
  12. Verses 24–25बेचने से बचे हुए मांस को चण्डालो के घरों के आस-पास के बागों में सूखने के लिए मैंने फैला द…
  13. Verses 26–28जिस दुर्दशा में लाठियों के आघात से कुत्ते आदि के उपद्रव को दूर करनेवाले ओर भीलों के तुल्य…
  14. Verses 29–32क्षुधा से पीड़ित और क्षीण उदरवाले मैंने मेघ के खण्ड के समान तुच्छ बकरे के मांस के टुकड़े…
  15. Verses 33–37वन में शीत से मेरे दाँत बजते थे और मारे जाड़े के मेरी आँखें तिरछी हो गई थी। मेरा शरीर स्य…
  16. Verse 38मैंने अपने मायारूपी जालों से लोगों को और डोरे के जालों से पक्षियों को क्लेश पहुँचाया और अ…
  17. Verses 39–42ही" जिनके क्षेत्रभेद का विभाग करनेवाला है ऐसी नारकी उत्कट भूमियों में मैंने पापरूपी बीजों…
  18. Verses 43–46विन्ध्याचल की गुफाओं में रहनेवाले मैंने जाल आदि मृगों को फँसाने के साधनों से मृगों पर अपन…
  19. Verse 47राजा के लड़के उसमें भी इकलौते लड़के अतएव दोषों से अत्यन्त निविड मैंने तब कल्प के सदुश साठ…
  20. Verse 48हे सभासद, दुर्वासनारूपी बेडी से वधे हुए अभागे मैंने वहाँ पर आप लोगों को जितना समय मालूम ह…