Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 107, Verses 2–7
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 107, verses 2–7 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 107 · श्लोक 2-7
संस्कृत श्लोक
सप्तरात्रोत्सवस्यान्ते क्रमान्मासाष्टके गते ।
पुष्पिता सास्य संपन्ना स्थिता गर्भवती ततः ॥ २ ॥
प्रसूता दुःखदां कन्यां विपद्दुःखक्रियामिव ।
सा कन्या ववृधे शीघ्रं मूर्खचिन्तेव पीवरी ॥ ३ ॥
पुनः प्रसूता सा वर्षैस्त्रिभिः पुत्रमशोभनम् ।
अनर्थमिव दुर्बुद्धिराशापाशविधायकम् ॥ ४ ॥
पुनः सुतां दुहितरं पुनरप्यर्भकं ततः ।
कलत्रवानहं जातो वने जरठपुल्कसः ॥ ५ ॥
तया सह समास्तत्र मया बह्व्षोऽतिवाहिताः ।
नारके चिन्तया सार्धं ब्रह्मघ्नेनेव यातनाः ॥ ६ ॥
शीतवातातपक्लेशविवशेन वनान्तरे ।
चिरं विलुलितं वृद्धकच्छपेनेव पल्वले ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
विविध यातनाओं को बिताता हे वैसे ही उसके साथ वहाँ पर मैंने बहुत वर्ष बिताये । जैसे बूढ़ा
कछुआ छोटी तलैया में चिरकाल तक चक्कर काटता रहता है वैसे ही शीत, वायु, ताप आदि
के कष्ट से पीडित मैं वन में फिरता रहा