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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 107, Verses 26–28

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 107, verses 26–28 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 107 · श्लोक 26-28

संस्कृत श्लोक

पुलिन्दवपुषा यत्र युक्तयोगैः समर्पिताः । तर्पिता लगुडाघातजितकौलेयरंहसा ॥ २६ ॥ पुत्रदाराः कदन्नेन ग्रामकान्धोचितेन च । धारासाररणत्पत्रशुष्कतालतले निशाः ॥ २७ ॥ नीता रणितदन्तेन सार्धं विपिनवानरैः । रोमभिः कोटिमुद्रोद्यैः शीतेनाध्युषितस्य मे ॥ २८ ॥

हिन्दी अर्थ

जिस दुर्दशा में लाठियों के आघात से कुत्ते आदि के उपद्रव को दूर करनेवाले ओर भीलों के तुल्य शरीरवाले मैंने कुग्राम के अन्धे लोगों के खाने योग्य कोदो आदि मोटे-मोटे अन्न से परम्परा सम्बन्ध से दैव द्वारा प्राप्त पुत्र, स्त्री आदि का भरण-पोषण किया । जिनके पत्ते मुसलाधार वृष्टि से शब्द करते थ ऐसे सूखे हुए ताड के पेड़ों के तले वन-वानरों के साथ जाड के मारे दाँतों को खटखटाते हुए मैंने रात्रियाँ बिताई । उस समय शीत से आक्रान्त मेरे शरीर में रोमों ने सूची के अग्रभाग का आकार धारण कर रक्खा था। और वर्षा ऋतु में वे मेघ के बिन्दुओं को मोतियों के तुल्य धारण करते थे