Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 107, Verse 16
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 107, verse 16 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 107 · श्लोक 16
संस्कृत श्लोक
चण्डालीकलहोद्विग्नचण्डचण्डालतर्जनैः ।
मुखं जर्जरतां यातमिन्दू राहुरदैरिव ॥ १६ ॥
हिन्दी अर्थ
चण्डाली के कलह से दुःखी हुए अतएव क्रुद्ध
चण्डालों के अत्यन्त तर्जन-भर्त्सन से मेरा मुख ऐसा जीर्ण-शीर्ण हो गया, जैसे कि राहु के
दाँतों से चन्द्रमा जीर्ण-शीर्ण हो जाता है