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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 107, Verses 18–23

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 107, verses 18–23 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 107 · श्लोक 18-23

संस्कृत श्लोक

हिमवत्कन्दरोद्गीर्णाश्चण्डा हेमन्तवीचयः । शिशिरे शीकरासारतुषारनिचयाश्चिरम् ॥ १८ ॥ अङ्गे निरम्बरे सोढा मृत्युमुक्ता इवेषवः । जराजरठमूढेन मूलानि क्षीणभूरुहाम् ॥ १९ ॥ सुकृतानामिवैकेन समुत्खातानि भूरिशः । शरावकेष्वटव्यां च पललं पक्वमादरात् ॥ २० ॥ अस्पृष्टेन जनैर्भुक्तं कुकलत्रवता मया । गृहीततेजःक्षतये बहुवक्रविकारिणा ॥ २१ ॥ मार्गाविकमिवात्मीयं विक्रीतं पण्यमन्यतः । प्राण्यङ्गवपुषस्तस्य प्रोत्कृत्त्योत्कृत्त्य पेशलः ॥ २२ ॥ आयसंपरि विक्रीता विन्ध्यपक्कणभूमिषु । जन्मान्तरसहस्रोत्थं स्वपापमिव वृद्धये ॥ २३ ॥

हिन्दी अर्थ

हिमालय की कन्दराओं से निकली हुई बड़ी भयंकर हेमन्त की लहरों, शिशिर में जलकणों की तेज वृष्टियों और बरफ की राशियों को मैंने वस्त्ररहित शरीर से सहन किया । ये सब इतनी भीषण थी कि मालूम पड़ता था मानों यमराज ने बाण छोड़े हों । बुढ़ापे से जीर्णं ओर मूढ हुए अकेले मैंने पुण्यों की नाई अनेक वृक्षों की जड खोद डाली । चण्डाल होने के कारण मुझे कोई छूता न था और मेरी स्त्री भी परले सिरे की डाकिन थी, अत: जंगल में हँड़िया आदि मिट्टी के बर्तनों में बड़ी लगन से पकाया हुआ मांस मैंने खाया । अपने तेज के नाश के लिए भाँति-भाँति के मुख के विकार करनेवाले मैंने अपने मांस की नाईं मृग और भेड़ का मांस अन्य लोगों से खरीदा । उनमें से कोमल-कोमल मांस को निकालकर और लोहे के पात्र में पकाकर विन्धायाचल के निवासी भीलों की बस्तियों में अधिक लाभ के लिए बेचा | वह मांस क्या था, मानों हजारों जन्मान्तरों मे उदित हुआ मेरा पाप ही था