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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 107, Verses 11–12

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 107, verses 11–12 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 107 · श्लोक 11,12

संस्कृत श्लोक

कलत्रापूरणोत्केन जर्जरेण हिमानिलैः । हेमन्ते दर्दुरेणेव विलीनं वनकुक्षिषु ॥ ११ ॥ नानाकलहकल्लोलतापप्रसरविद्रुताः । बाष्पव्याजेन निर्मुक्ता नेत्राभ्यां रक्तबिन्दवः ॥ १२ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे हेमन्त ऋतु में मेढक वन के मध्य में छिप जाता है वैसे ही जाड़ा ओर शीतवायु से जर्जरित ओर कुटुम्ब के भरण-पोषण में उत्कण्ठित मैं वन के अन्दर छिपा रहा । नाना प्रकार के कलह कल्लोलों के सन्ताप से पिघले हुए खून की बूँदें, आँसुओं के बहाने, मैंने अपनी आँखों से छोडी ।