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Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker) · Sarga 14

तेरहवाँ सर्ग समाप्त चौदहवाँ सर्ग साधुसंगम, सत्‌ शास्त्र के अभ्यास और अन्तःकरण की शुद्धि से बुद्धि को प्राप्त एवं शम और सन्तोष के हेतु विचार की प्रशंसा ।

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  1. Verse 1पूर्वोक्त रीति से शमनामक पहले मोक्षद्रारपाल का वर्णन कर विचार नामक दूसरे द्वारपाल का वर्ण…
  2. Verses 2–27उत्पन्न नहीं होता हे महाप्राज्ञ, बन्धुनाश आदि दुःख दूर हो और चित्त में शान्ति आये, वह मोह…
  3. Verses 28–30विचार का फल केवल भय की निवृत्ति ही नहीं है, किन्तु निरतिशय आनन्द की प्राप्ति भी उसका फल ह…
  4. Verses 31–41यदि चित्त विचार से उत्पन्न ज्ञान से नष्ट हो गया, तो जीवन ही नहीं रहेगा, यदि नष्ट न हुआ, त…
  5. Verses 42–49विचारों में भी जो सारभूत (श्रेष्ठतम) विचार है, उसका निर्देश करते हैं । परमात्मप्राय (सदा…
  6. Verses 50–53आदि क्लेश से होनेवाले दुष्ट छेद के लिए ही बनाया है, अन्यत्र उसका कोई भी उपयोग नहीं हे, क्…
  7. Verse 54विस्तारपूर्वक कटे गये विचार का ही संक्षेपतः उपसंहार करते है - श्रीरामजी, अतः पृथिवी में स…