Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 14, Verses 2–27
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 14, verses 2–27 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 14 · श्लोक 2-27
संस्कृत श्लोक
विचारात्तीक्ष्णतामेत्य धीः पश्यति परं पदम् ।
दीर्घसंसाररोगस्य विचारो हि महौषधम् ॥ २ ॥
आपद्वनमनन्तेहापरिपल्लविताकृति ।
विचारक्रकचच्छिन्नं नैव भूयः प्ररोहति ॥ ३ ॥
मोहेन बन्धुनाशेषु संकटेषु शमेषु च ।
सर्वं व्याप्तं महाप्राज्ञ विचारो हि सतां गतिः ॥ ४ ॥
न विचारं विना कश्चिदुपायोऽस्ति विपश्चिताम् ।
विचारादशुभं त्यक्त्वा शुभमायाति धीः सताम् ॥ ५ ॥
बलं बुद्धिश्च तेजश्च प्रतिपत्तिः क्रियाफलम् ।
फलन्त्येतानि सर्वाणि विचारेणैव धीमताम् ॥ ६ ॥
युक्तायुक्तमहादीपमभिवाञ्छितसाधकम् ।
स्फारं विचारमाश्रित्य संसारजलधिं तरेत् ॥ ७ ॥
आलूनहृदयाम्भोजान्महामोहमतङ्गजान् ।
विदारयति शुद्धात्मा विचारो नाम केसरी ॥ ८ ॥
मूढाः कालवशेनेह यद्गताः परमं पदम् ।
तद्विचारप्रदीपस्य विजृम्भितमनुत्तमम् ॥ ९ ॥
राज्यानि संपदः स्फारा भोगो मोक्षश्च शाश्वतः ।
विचारकल्पवृक्षस्य फलान्येतानि राघव ॥ १० ॥
या विवेकविकासिन्यो मतयो महतामिह ।
न ता विपदि मज्जन्ति तुम्बकानीव वारिणि ॥ ११ ॥
विचारोदयकारिण्या धिया व्यवहरन्ति ये ।
फलानामत्युदाराणां भाजनं हि भवन्ति ते ॥ १२ ॥
मूर्खहृत्काननस्थानामाशाप्रथमरोधिनाम् ।
अविचारकरञ्जानां मञ्जर्यो दुःखरीतयः ॥ १३ ॥
कज्जलक्षोदमलिना मदिरामदधर्मिणी ।
अविचारमयी निद्रा यातु ते राघव क्षयम् ॥ १४ ॥
महापदतिदीर्घेषु सद्विचारपरो नरः ।
न निमज्जति मोहेषु तेजोराशिस्तमःस्विव ॥ १५ ॥
मानसे सरसि स्वच्छे विचारकमलोत्करः ।
नूनं विकसितो यस्य हिमवानिव भाति सः ॥ १६ ॥
विचारविकला यस्य मतिर्मान्द्यमुपेयुषः ।
तस्योदेत्यशनिश्चन्द्रान्मुधा यक्षः शिशोरिव ॥ १७ ॥
दुःखखण्डकमस्थूलं विपन्नवलतामधुः ।
राम दूरे परित्याज्यो निर्विवेको नराधमः ॥ १८ ॥
ये केचन दुरारम्भा दुराचारा दुराधयः ।
अविचारेण ते भान्ति वेतालास्तमसा यथा ॥ १९ ॥
अविचारिणमेकान्तवनद्रुमसधर्मकम् ।
अक्षमं साधुकार्येषु दूरे कुरु रघूद्वह ॥ २० ॥
विविक्तं हि मनो जन्तोराशावैवश्यवर्जितम् ।
परां निर्वृतिमभ्येति पूर्णचन्द्र इवात्मनि ॥ २१ ॥
विवेकितोदिता देहे सर्वं शीतलयत्यलम् ।
अलंकरोति चात्यन्तं ज्योत्स्नेव भुवनं यथा ॥ २२ ॥
परमार्थपताकाया धियो धवलचामरम् ।
विचारो राजते जन्तो रजन्यामिव चन्द्रमाः ॥ २३ ॥
विचारचारवो जीवा भासयन्तो दिशो दश ।
भान्ति भास्करवन्नूनं भूयो भवभयापहाः ॥ २४ ॥
बालस्य स्वमनोमोहकल्पितः प्राणहारकः ।
रात्रौ नभसि वेतालो विचारेण विलीयते ॥ २५ ॥
सर्वं एव जगद्भावा अविचारेण चारवः ।
अविद्यमानसद्भावा विचारविशरारवः ॥ २६ ॥
पुंसो निजमनोमोहकल्पितोऽनल्पदुःखदः ।
संसारचिरवेतालो विचारेण विलीयते ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
उत्पन्न नहीं होता हे महाप्राज्ञ, बन्धुनाश आदि दुःख दूर हो और चित्त में शान्ति आये, वह
मोह से व्याप्त है अर्थात् बुद्धि में स्फुरित नहीं होता | वहाँ पर विचार ही सज्जनों का परम
आश्रय है अर्थात् उचित कर्तव्य के अनुसन्धान में हेतु है दुःखसन्तरण के लिए विद्वानों के
पास विचार के सिवा ओर कोई उपाय नहीं है, सज्जनो की मति विचार से अशुभ का त्यागकर
शुभ को प्राप्त होती हे बुद्धिमानों के बल, बुद्धि, सामर्थ्य ओर समयोचित स्फूर्ति, क्रिया ओर
उसका फल ये सब विचार से ही सफल होते हैँ । यह युक्त है ओर वह अयुक्त है, इसके
प्रकाशन में महादीपकरूप एवं अभीष्ट वस्तु की सिद्धि करनेवाले प्रचुर विचार का अवलम्बन
कर संसाररूप सागर को पार करना चाहिए। हृदयस्थित विवेकरूप कमल को कुचल डालनेवाले
महामोहरूपी हाथियों को विशुद्ध विचाररूपी सिंह मार डालता हे । संसारसंतरण के उपाय से
अनभिज्ञ लोग समय पाकर जो परमपद को प्राप्त हुए हैं, वह विचाररूप प्रदीप का ही
उपायप्रकाशनजन्य सर्वोत्तम फल है । हे राघव, बड़े बड़े राज्य महती सम्पत्तिर्यो भोग ओर
अविनाशी मोक्ष ये सब विचाररूपी कल्पवृक्ष के फल हे । इस संसार में महापुरुषों की विवेक से
विकसित जो मतिर्यो हैं वे जल में फेंकी गई तुम्बियों के समान विपत्ति में विषाद को प्राप्त नहीं
होती । जो लोग विचार को उत्पन्न करनेवाली (विचारवती) बुद्धि से व्यवहार करते हैं, वे लोग
अतिश्रेष्ठ फलों के पात्र होते हैं, इसमें कोई सन्देह नहीं है विविध दुःख मूर्खो के हृदयरूपी वन
में स्थित तथा मुमुक्षा को (मुक्ति की इच्छा के) सर्व प्रथम रोकनेवाले अविचाररूपी करंज वृक्ष
की मंजरियाँ हैं अर्थात् जैसे करंज वृक्ष वन में उगते हँ ओर अपने बढाव से दिशाओं को रोकते
हैँ वैसे ही अविचार मूर्खजनों के हृदय मेँ वास करता है ओर मोक्ष की आशा को रोक देता हे ।
उसी अविचार का फल दुःख हे । हे रघुवंशमणे, आपकी अंजन के चूर्ण के ढेर के समान काली
ओर मदिरा (शराब) के नशे में होनेवाले चिह्“ों से-भ्रम ओर स्खलन आदिसे-युक्त
अविचाररूपी नींद नाश को प्राप्त हो । जैसे सूर्य निविड अन्धकारो में भी निमग्न नहीं होता,
किन्तु स्वयं अन्धकार का विनाश कर सदा प्रकाशमान रहता है, वैसे ही सद्विचार में तत्पर
पुरूष बड़ी-बड़ी आपत्तियों से युकत एवं अतिविस्तारयुक्त अज्ञानों मेँ निमग्न नहीं होता ।
जिसके अतिनिर्मल मनरूपी तालाब मे विचाररूप कमलराशि खिल जाती है, वह हिमालय की
भाँति शोभा को प्राप्त होता है। अर्थात् शीलता, उन्नतता, स्थिरता आदि गुणों से हिमालय के
सदश शोभित होता हे । हिमालय में भी निर्मल मानस सरोवर है ओर उसमें सदा कमल खिले
रहते हैं| मूढता को प्राप्त हुए जिस पुरुष की बुद्धि विचारशून्य हे, उसके लिए चन्द्रमा से वज
उत्पन्न होता है, जैसे मूर्खतावश बालक के लिए यक्ष (वेताल) उत्पन्न होता है । भाव यह है
कि मन का देवता चन्द्रमा है ओर मन चन्द्रमा की नाई प्रकाश के योग्य है, इसलिए मन में
चांदनी के तुल्य ज्ञानजन्य सुख का ही आविर्भाव होना उचित हे । जिस मूर्ख के मन में शोक,
दुःख की उत्पत्ति होती है, उसके लिए चन्द्रमासे भी व्र उत्पन्न होता है, जैसे कि बालक की
मूर्खता से वेताल उत्पन्न होता हे । विवेकशून्य अधम पुरूष निरन्तर दु:ःख-बीजों को रखने के
लिए बनाया गया अति विशाल कुसूल (कोटिला) है एवं विपत्तिरूपी नवीन लताओं के विकास
का कारण वसन्त है, ऐसे अधम पुरुष का दूर से त्याग कर देना चाहिए। जो कोई अपने को और
दूसरों को दु:ख देनेवाले कार्य हैं, जो कोई निषिद्ध कार्य है और जो मानसिक पीड़ाएँ हैं, वे सब
अन्धकार से वेताल की नाई अविचार से (अविवेक से) ही उत्पन्न होते हैं । हे रघुकुलतिलक,
जिस पुरूष में विवेक नहीं है, वह निर्जन स्थान में उगे हुए वन वृक्ष के सदृश है ओर पुरुषार्थ के
उपयोगी सत्कर्म करने में असमर्थ है, उससे सदा दूर रहना चाहिए निर्जन स्थान में उत्पन्न वृक्ष
भी सज्जन बटोहियों (पथिको) को छाया में आश्रय देना आदि कार्यो मेँ असमर्थ रहता हे ।
विचारपूर्णं अतएव आशा की अधीनता से विमुक्त अधिकारी प्राणियों का मन पूर्णचन्द्र की
नाई आत्मा में परम विश्रामसुख को प्राप्त होता है । जैसे उदित हुई चाँदनी अत्यन्त शोभा कर
देती है और जल प्यासे प्राणी को शीतल कर देता हे, वैसे ही देह मे जब विवेकशीलता उदित
होती है, तब वह सबको अत्यन्त विभूषित कर देती है ओर शीतल कर देती है । जैसे रात्रि में
चन्द्रमा शोभित होता है अर्थात् रात्रि का असाधारण चिह्न चन्द्रमा शोभित होता है, वैसे ही
अधिकारी ब्राह्मण आदि कुल में जन्म लिए हुए पुरुष की सर्वश्रेष्ठ पुरुषार्थरूप (मोक्षरूप)
राजत्वप्राप्ति की सूचिका होने के कारण पताकाभूत शुद्ध बुद्धि का विचार चँवर-सा (असाधारण
राजचिह-सा) शोभित होता हे । विचार से ही क्रमशः जीवन्मुक्त हुए जीव दसों दिशाओं को
देदीप्यमान करते हुए सूर्य के तुल्य सुशोभित होते हैं, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं है, अपने
प्रकाश से सूर्य अन्धकार का विनाश करते हैं और ये विचाररूपी प्रकाशसे अनेक प्राणियों के
संसार-रूपी अन्धकारका विनाश करते हें । जैसे रात्रि में बालकको बाहर न निकलने देने के
लिए आकाश में कल्पित प्राणनाशक वेताल विचार से विनष्ट हो जाता है, वैसे ही अपने मन के
अज्ञान से कल्पित स्वरूप का विनाशक यह संसार विचार से विलीन हो जाता है । जगत के
सभी पदार्थ अविचार न करने से ही भले लगते हैं, सत्य पदार्थ की नाई सुन्दर लगते हैं, वास्तव
में उनका अस्तित्व नहीं है, इसीलिए वे विचार करने से पत्थर से तोड़े गये मिट्टी के ढेले की नाई
तहस-नहस हो जाते हैँ, मिथ्या प्रतीत हो जाते हैँ । यह संसाररूपी पुराना वेताल बड़ा दु-खप्रद
है, पुरुषने अपने मन में स्थित अज्ञान से इसकी कल्पना कर रक्खी है, यह विचार करने से
विलीन हो जाता हे