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Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 14, Verses 28–30

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 14, verses 28–30 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 14 · श्लोक 28-30

संस्कृत श्लोक

समं सुखं निराबाधमनन्तमनपाश्रयम् । विद्धीमं केवलीभावं विचारोच्चतरोः फलम् ॥ २८ ॥ अचलस्थितितोदारा प्रकटाभोगतेजसा । तेन निष्कामतोदेति शीततेवेन्दुनोदिता ॥ २९ ॥ स्वविचारमहौषध्या साधुश्चित्तनिषण्णया । तयोत्तमत्वप्रदया नाभिवाञ्छति नोज्झति ॥ ३० ॥

हिन्दी अर्थ

विचार का फल केवल भय की निवृत्ति ही नहीं है, किन्तु निरतिशय आनन्द की प्राप्ति भी उसका फल है, ऐसा कहते है । ब्रह्मकैवल्य को उत्तम फल जानो, जो कैवल्य सुखरूप है, जिसमें जगत्‌ की विषमता का तनिक भी सम्पर्कं नहीं है, जिसका कभी बाध नहीं होता ओर जो दूसरे के आधीन नहीं हे । जैसे चन्द्रमा के उदय से शीतता का उदय होता है, वैसे ही विचार से उत्पन्न निरतिशय आनन्द के बल से चंचलता के कारण अज्ञान का विनाश होने पर निश्चल स्थिति से उदार आनन्दपूर्णतारूप निष्कामता का उदय होता है । अचल स्थिति ही सर्वश्रेष्ठ हे । उक्त अचल स्थिति को देनेवाली चित्त मेँ स्थित आत्मविचाररूपी महौषधि से सिद्ध हुआ पुरूष न तो अप्राप्त वस्तु की इच्छा करता है और न प्राप्त का त्याग करता हे, कृतकृत्य हो जाता है, यह अर्थ हे