Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 14, Verses 50–53
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 14, verses 50–53 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 14 · श्लोक 50-53
संस्कृत श्लोक
कोऽहं कथमयं दोषः संसाराख्य उपागतः ।
न्यायेनेति परामर्शो विचार इति कथ्यते ॥ ५० ॥
अन्धान्धमोहसुधनं चिरं दुःखाय केवलम् ।
कृतं शिलाया हृदयं दुर्मतेश्चाविचारिणः ॥ ५१ ॥
भावाभावग्रहोत्सर्गदृशामिह हि राघव ।
न विचारादृते तत्त्वं ज्ञायते साधु किंचन ॥ ५२ ॥
विचाराज्ज्ञायते तत्त्वं तत्त्वाद्विश्रान्तिरात्मनि ।
अतो मनसि शान्तत्वं सर्वदुःखपरिक्षयः ॥ ५३ ॥
हिन्दी अर्थ
आदि क्लेश से होनेवाले दुष्ट छेद के लिए ही बनाया है, अन्यत्र उसका कोई भी उपयोग
नहीं हे, क्योकि वह अन्धे से भी अन्धा और मोह से अत्यन्त घना है । अन्धा देखे बिना कुएँ
में गिरता है, दुर्बुद्धि का मन देखकर भी मोहवश नरक में गिरता हे । (पत्थर के पक्ष में) जड़
होने से अन्धे से भी अन्धा है और कठोर होने से मोह से भी अधिक घना हे हे श्रीरामचन्द्रजी,
इस व्यवहारभूमि में सत्य के ग्रहण ओर असत्य के त्याग को देख रहे विद्वानों को विचार के
बिना उत्तम तत्त्व कुछ भी प्रतीत नहीं होता । विचार से तत्त्व का ज्ञान होता है, तत्त्वज्ञानसे
विश्रान्ति (मनकी निश्चलता) होती हे । विश्रान्ति से मन में जो शान्ति प्राप्त होती है, वही
सम्पूर्ण दुःखों का विनाश है