Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 14, Verses 42–49
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 14, verses 42–49 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 14 · श्लोक 42-49
संस्कृत श्लोक
परमात्ममयी मान्या महानन्दैकसाधिनी ।
क्षणमेकं परित्याज्या न विचारचमत्कृतिः ॥ ४२ ॥
विचारचारुपुरुषो महतामपि रोचते ।
परिपक्वचमत्कारं सहकारफलं यथा ॥ ४३ ॥
विचारकान्तमतयो नानेकेषु पुनःपुनः ।
लुठन्ति दुःखश्वभ्रेषु ज्ञाताध्वगतयो नराः ॥ ४४ ॥
नच रौति तथा रोगी नानर्थशतजर्जरः ।
अविचारविनष्टात्मा यथाऽज्ञः परिरोदिति ॥ ४५ ॥
वरं कर्दममेकत्वं मलकीटकता वरम् ।
वरमन्धगुहाहित्वं न नरस्याविचारिता ॥ ४६ ॥
सर्वानर्थनिजावासं सर्वसाधुतिरस्कृतम् ।
सर्वदौस्थित्यसीमान्तमविचारं परित्यजेत् ॥ ४७ ॥
नित्यं विचारयुक्तेन भवितव्यं महात्मना ।
तथान्धकूपे पततां विचारो ह्यवलम्बनम् ॥ ४८ ॥
स्वयमेवात्मनात्मानमवष्टभ्य विचारतः ।
संसारमोहजलधेस्तारयेत्स्वमनोमृगम् ॥ ४९ ॥
हिन्दी अर्थ
विचारों में भी जो सारभूत (श्रेष्ठतम) विचार है, उसका निर्देश करते हैं ।
परमात्मप्राय (सदा परमात्मा में संलग्न) महान् आनन्द की एकमात्र साधन आदरणीय
विचारधारा का एक क्षण के लिए भी परित्याग नहीं करना चाहिए । जैसे परिपाक होने के
कारण अत्यन्त माधुर्य से युक्त आम का फल महापुरुषों को भी अच्छा लगता है, वैसे ही
विचार से रमणीय पुरूष तत्त्वज्ञोंको भी अच्छा लगता है, जिज्ञासुओं की तो बात ही क्या
है ? विचार से जिनकी मति अतिनिमर्ल है और विचार से ही जिन्हें ज्ञानमार्ग मे गमन ज्ञात
है, वे अनेक दुःखमय गर्तो में (जन्म-मरणपरम्परा में) बार-बार नहीं गिरते । रोग, विष,
शस्त्र की चोट आदि सैकड़ों दुःखों से शिथिल शरीरवाला रोगी वैसा नहीं रोता जैसा कि
अविचार से जिसने अपनी आत्मा का प्राय: हनन कर दिया है, वह मूर्ख पुरुष विविध जन्म-
मरण परम्पराओं में रोता हे । कीचड़ में मेंढक बनना अच्छा है, विष्ठा का कीड़ा बनना अच्छा
है और अँधेरी गुफा में साँप होना अच्छा है, पर मनुष्य का अविचारी होना अच्छा नहीं है।
अविचार सम्पूर्ण क्लेशों का अपना निजी घर है, सम्पूर्ण सज्जन द्वारा तिरस्कृत है, एवं
समस्त दुर्गातियों की चरम सीमा है, इसलिए उसका परित्याग कर देना चाहिए । महात्मा
पुरूष को सदा विचारशील होना चाहिए, लोक में यह बात प्रसिद्ध है कि अन्धकूपरूप राग
द्वेष आदि में गिर रहे लोगों का विचार अवलम्बन है । विचारपूर्वक स्वयं ही अपने आत्मा से
राग, द्वेषादि प्रवाह में गिर रहे अपने आत्मा को जबरदस्ती स्थिरकर संसाररागरूपी सागर से
अपने मनरूपी मृग को उतारना चाहिए