Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 14, Verses 31–41
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 14, verses 31–41 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 14 · श्लोक 31-41
संस्कृत श्लोक
तत्पदालम्बनं चेतः स्फारमाभासमागतम् ।
नास्तमेति न चोदेति खमिवातिततान्तरम् ॥ ३१ ॥
न ददाति न चादत्ते न चोन्नमति शाम्यति ।
केवलं साक्षिवत्पश्यञ्जगदाभोगि तिष्ठति ॥ ३२ ॥
न च शाम्यति नाप्यन्तर्नापि बाह्येऽवतिष्ठति ।
न च नैष्कर्म्यमादत्ते न च कर्मणि मज्जति ॥ ३३ ॥
उपेक्षते गतं वस्तु संप्राप्तमनुवर्तते ।
न क्षुब्धो न च वाऽक्षुब्धो भाति पूर्ण इवार्णवः ॥ ३४ ॥
एवं पूर्णेन मनसा महात्मानो महाशयाः ।
जीवन्मुक्ता जगत्यस्मिन्विहरन्तीह योगिनः ॥ ३५ ॥
उषित्वा सुचिरं कालं धीरास्ते यावदीप्सितम् ।
ते तमन्ते परित्यज्य यान्ति केवलतां तताम् ॥ ३६ ॥
कोऽहं कस्य च संसार इत्यापद्यपि धीमता ।
चिन्तनीयं प्रयत्नेन सप्रतीकारमात्मना ॥ ३७ ॥
कार्यसंकटसंदेहं राजा जानाति राघव ।
निष्फलं सफलं वापि विचारेणैव नान्यथा ॥ ३८ ॥
वेदवेदान्तस्रिद्धान्तस्थितयः स्थितिकारणम् ।
निर्णीयन्ते विचारेण दीपेन च भुवो निशि ॥ ३९ ॥
अनष्टमन्धकारेषु बहुतेजःस्वजिह्मितम् ।
पश्यत्यपि व्यवहितं विचारश्चारुलोचनम् ॥ ४० ॥
विवेकान्धो हि जात्यन्धः शोच्यः सर्वस्य दुर्मतिः ।
दिव्यचक्षुर्विवेकात्मा जयत्यखिलवस्तुषु ॥ ४१ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि चित्त विचार से उत्पन्न ज्ञान से नष्ट हो गया, तो जीवन ही नहीं रहेगा, यदि नष्ट न
हुआ, तो फिर नाना विक्षेपों को उत्पन्न करेगा, ऐसी परिस्थिति में कृतकृत्यता तो मृगतृष्णा ही
ठहरी, इस शका पर कहते हैं।
सच्चित् आनन्दघन परब्रह्म परमात्मा में लगे हुए अतएव अत्यन्त आभासता को प्राप्त
हुए (जैसे भूजे हुए बीज बीजाभास हो जाते हैं अर्थात् उनमें अंकुर पैदा करने की सामर्थ्य
नहीं रह जाती, वैसे ही आभासता को प्राप्त हुए) चित्तविक्षेपहेतु वासनाएँ आकाश की नाई
अति विस्तीर्ण ब्रह्मभाव को प्राप्त हो जाती है, अतएव वह न तो विनाश को प्राप्त होता है
जिससे कि जीवन ही न रहे और न राग, द्वेष आदि वृत्तियों से फिर उदय को ही प्राप्त होता
है, जिससे कि विक्षेप हों (०७) । क्योंकि ब्रह्मवेत्ता पुरुष विशाल जगत् को (जगत् में स्थित
विविध विषयों को) केवल उदासीनता से देखता रहता है, उनमें आसक्त होकर मन नहीं
लगाता केवल उदासीनता से देखता रहता हे, उनमें आसक्त होकर मन नहीं लगाता ओर
न सत्य या पुरुषार्थ समञ् कर उनका उपभोग ही करता है और न सुषुप्ति अवस्था की तरह
उपाधि की शान्ति से शान्त होता है, न स्वप्न की नाई मनोवासनामय पदार्थो में आसक्त
होता है और न मूढ जनों की जाग्रत् अवस्था के सदृश बाह्य विषयों के फन्दे में फँसता है
तथा नैष्कर्म्यका अवलम्बन करता है ओर न कर्मों में ही उलझा रहता हे । ब्रह्मज्ञ पुरूष पूर्ण
सागर के समान शोभित होता है, वह गई हुई (नष्ट हुई) वस्तु की उपेक्षा कर देता है अर्थात्
उसकी प्राप्ति के लिए यत्न नहीं करता ओर प्राप्त वस्तु का अनुसरण करता है, उसे क्षोभ
नहीं होता ओर निश्चल नही होता हे अर्थात् स्वाभाविक व्यवहार का त्याग करता हुआ निश्चल
नहीं होता हे । (समुद्र पक्ष में) समुद्र भी गये हुए लक्ष्मी, कोस्तुभमणि आदि वस्तु की उपेक्षा
करता हे, प्राप्त अन्यान्य रत्नों से अपना व्यवहार करता है, उसे मयदिात्याग पर्यन्त क्षुब्धता
नहीं होती ओर वह निश्चल भी नहीं होता । इस प्रकार पूर्ण मन से युक्त इसी शरीर में अनुभव
में आ रहे जीवब्रह्मैक्यरूप योगवाले जीवन्मुक्त उदार महात्मा इस जगत् में विहार करते हैं,
विचरते हैं । वे धीर महात्मा अपनी इच्छानुसार चिरकालतक इस संसार में निवास कर अन्त
में देह, इन्द्रिय आदि उपाधि का त्याग कर अपिरिच्छिन्न विदेहकैवल्य को प्राप्त होते हैं ।
बुद्धिमान् पुरुष को आपत्ति में भी (कुटुम्ब आदि फन्दे में फँसे रहने पर भी) मैं कोन हूँ, यह
संसार किसका है ? यों संसार से छुटकारा पाने के उपाय श्रवण आदि के अनुष्ठान के साथ
स्वयं ही प्रयत्नपूर्वक विचार करना चाहिए । हे श्रीरामचन्द्रजी, राजा सफल चाहे निष्फल
अवश्य कर्तव्य सन्धि, विग्रह आदि का निश्चय विचार से ही करता है, विचार के सिवा उसका
२४ अथवा इस श्लोक का अर्थ यों करना चाहिए । परब्रह्म परमात्मा मेँ संलग्न अतएव ब्रह्मभाव
को प्राप्त हुआ चित्त भूँजे हुए बीजों के समान न तो उगता है, जिससे कि विक्षेप का डर हो और न
अनादि वासना से दृढ़ हुआ चित्त विषयसंस्कार से विनाश को ही प्राप्त होता है जिससे कि जीवन
का असंभव हो।
निश्चायक दूसरा मार्ग नहीं है । जैसे रात्रि में घट, पट आदि पदार्थों का परिज्ञान दीपक से
होता है, वैसे ही पुरुषार्थप्राप्ति के हेतु वेद और वेदान्तसिद्धान्त के सारभूत धर्म तथा ब्रह्मतत्त्व
का निर्णय विचार से ही किया जाता हैं । विचाररूपी सुन्दर नेत्र अन्धकार मेँ नष्ट-सा (व्यर्थ-
सा) नहीं होता, अति तेजस्वी सूर्य आदि में कुण्ठित नहीं होता एवं जो वस्तु सामने नहीं है,
व्यवहित है उसे भी देख लेता हे । प्रसिद्ध नेत्र अन्धकार में नष्ट से हो जाते हैं प्रचुर तेजवाले
सूर्य आदि को नहीं देख सकते, चकाचौंध होने के कारण कुण्ठित हो जाते हैं, एवं जो वस्तु
व्यवहित है और दूर है उसे नहीं देख सकते । जो पुरुष विवेकान्ध (विवेकरूपी नेत्रों से हीन)
है वह जन्मान्ध है, उस दुर्मति के लिए सब शोक करते हैं, जिस पुरूष को विवेक आत्मा की
नाईं प्रिय है, वह दिव्यचक्षु है वह सम्पूर्ण वस्तुओं में श्रेष्ठ है, अर्थात् वह आपत्तियों पर विजय
पाता है अथवा परम पुरुषार्थ (मोक्ष) को प्राप्त करता हे