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Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker) · Sarga 11

ढसवाँ सर्ग समाप्त ग्यारहवाँ सर्गं ज्ञानप्राप्ति का विस्तार, श्रीरामचन्द्रजी के वैराग्य की स्तुति ओर वक्ता तथा प्रश्नकर्ता के लक्षण आदि का प्रधानतः वर्णन |

15 verse-groups

  1. Verses 1–2श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे पुण्यचरित, ज्ञान का पृथिवी पर अवतरण, अपने जन्म, ज्ञानावरोध, पुनः…
  2. Verse 3उक्त पुण्यपरिपाक की किन लक्षणों से पहचान करनी चाहिए एवं उस लक्ष्यभूत पदार्थ के उपदेश की प…
  3. Verses 4–19श्रीवसिष्ठजी ने कहा : राजकुमार, जैसे सागर में तरंग बार बार उत्पन्न होती है वैसे ही प्रचुर…
  4. Verse 20परन्तप, आपके अतिनिर्मल मन में “श्मशानमापदं दैन्यम्‌" इत्यादिसे आगे कहे जानेवाले दृष्ट निम…
  5. Verses 21–24हे श्रीरामचन्द्र, सम्पूर्ण विवेकी पुरुषों में सर्वश्रेष्ठ रूप से विख्यात साधु का सब विषयो…
  6. Verses 25–30हे परन्तप, केवल अपने विवेक से उत्पन्न तत्त्वपदार्थ के प्रति अभिमुखता से अन्य विषयों से वि…
  7. Verses 31–33-तपःप्रभावाद्‌ देवप्रसादाच्च“ (तप के प्रताप से और देवता की प्रसन्नता से “यस्यदेवे परा भक्…
  8. Verses 34–44ऐसी परिस्थिति में ब्रह्मजिज्ञासा के प्रयोजक विचार का उदय ही दुर्लभ है, यह भाव है। जब तक प…
  9. Verses 45–49हे वक्‍ताओं में श्रेष्ठ श्रीरामजी, जो पुरुष ततत्ववस्तु को नहीं जानता अतएव जिसका वचन ग्राह…
  10. Verse 50प्रश्नकर्ता की श्रुति आदि प्रमाणो से निर्णीत पदार्थ के ग्रहण की योग्यता का विचार किये बिन…
  11. Verses 51–55हे रघुनन्दन, आप अत्यन्त श्रेष्ठ प्रश्नकर्ता है ओर मैं उपदेश देना जानता हूँ, इसलिए हमारा य…
  12. Verses 56–63हे श्रीरामचन्द्रजी, संसाररूपी वन का बन्दर मन बड़ा ही चपल है, उसको संस्कार द्वारा अपने वश…
  13. Verses 56–67हे रघुकुलतिलक, आप तो जैसे सूर्य का उदय होने पर कमल विकसित होता है, वैसे ही सौजन्य आदि गुण…
  14. Verses 68–72प्रज्ञा की अभिवृद्धि में शास्त्राभ्यास ही उपाय है, इस अभिप्राय से कहते हैं। संस्कृत (विशु…
  15. Verse 73मेरी बुद्धि विकासयुक्त है या नहीं, यों सन्देह कर रहे श्रीरामचन्द्रजी को आश्वासन देते हुए…