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Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 11, Verses 4–19

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 11, verses 4–19 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 11 · श्लोक 4-19

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । परमे ब्रह्मणि ब्रह्मा स्वभाववशतः स्वयम् । जातः स्पन्दमयो नित्यमूर्मिरम्बुनिधाविव ॥ ४ ॥ दृष्ट्वैवमातुरं सर्ग सर्गस्य सकलां गतिम् । भूतभव्यभविष्यस्थां दश परमेश्वरः ॥ ५ ॥ सक्रियाक्रमकालस्य कृतादेः क्षय आगते । मोहमालोच्य लोकानां कारुण्यमगमत्प्रभुः ॥ ६ ॥ ततो मामीश्वरः सृष्ट्वा ज्ञानेनायोज्य चासकृत् । विससर्ज महीपीठं लोकस्याज्ञानशान्तये ॥ ७ ॥ यथाहं प्रहितस्तेन तथान्ये च महर्षयः । सनत्कुमारप्रमुखा नारदाद्याश्च भूरिशः ॥ ८ ॥ क्रियाक्रमेण पुण्येन तथा ज्ञानक्रमेण च । मनोमोहामयोन्नद्धमुद्धर्तुं लोकमीरिताः ॥ ९ ॥ महर्षिभिस्ततस्तैस्तैः क्षीणे कृतयुगे पुरा । क्रमात्क्रियाक्रमे शुद्धे पृथिव्या तनुतां गते ॥ १० ॥ क्रियाक्रमविधानार्थं मर्यादानियमाय च । पृथग्देशविभागेन भूपालाः परिकल्पिताः ॥ ११ ॥ बहूनि स्मृतिशास्त्राणि यज्ञशास्त्राणि चावनौ । धर्मकामार्थसिद्ध्यर्थं कल्पितान्युचितान्यथ ॥ १२ ॥ कालचक्रे वहत्यस्मिंस्ततो विगलिते क्रमे । प्रत्यहं भोजनपरे जने शाल्यर्जनोन्मुखे ॥ १३ ॥ द्वन्द्वानि संप्रवृत्तानि विषयार्थे महीभुजाम् । दण्ड्यतां संप्रयातानि भूतानि भूवि भूरिशः ॥ १४ ॥ ततो युद्ध विना भूपा मही पालयितुं क्षमाः । न समथोस्तदा याताः प्रजाभिः सह दैन्यताम् ॥ १५ ॥ तेषां दैन्यापनोदार्थं सम्यग्दृष्टिक्रमाय च । ततोऽस्मदादिभिः प्रोक्ता महत्यो ज्ञानदृष्टयः ॥ १६ ॥ अध्यात्मविद्या तेनेयं पूर्व राजसु वर्णिता । तदनु प्रसृता लोके राजविद्येत्युदाहृता ॥ १७ ॥ राजविद्या राजगुह्यमध्यात्मज्ञानमुत्तमम् । ज्ञात्वा राघव राजानः परां निर्दुःखतां गताः ॥ १८ ॥ अथ राजस्वतीतेषु बहुष्वमलकीर्तिषु । अस्माद्दशरथाद्राम जातोऽद्य त्वमिहावनौ ॥ १९ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीवसिष्ठजी ने कहा : राजकुमार, जैसे सागर में तरंग बार बार उत्पन्न होती है वैसे ही प्रचुर क्रियाशक्ति से सम्पन्न ब्रह्मा अपने पूर्वजन्म की विद्या, कर्म और वासनाओं के प्रकर्ष से परम ब्रह्म में उत्पन्न हुए। उन्होंने विविध प्राणियों की सृष्टि करने के अनन्तर सृष्ट लोगों को इस प्रकार जन्म, मरण, नरक आदि से अपने अज्ञान के कारण दुःखी देखकर वर्तमान सृष्टि के दृष्टान्त से अतीत, वर्तमान और भविष्यकाल की सृष्टि की सम्पूर्ण अवस्थाओं का अनुमान कर लिया । विशेषरूप से स्वर्ग ओर मोक्ष के साधनों के अनुष्ठान के योग्य सत्ययुग आदि समय के क्षीण होने पर लोगों मे सिक्का जमानेवाले अज्ञान का प्राबल्य देखकर भगवान्‌ ब्रह्माजी को बड़ी दया आई । तदुपरान्त भगवान्‌ ब्रह्माजी ने मेरी सृष्टि कर और बार बार उपदेश द्वारा मुझे ज्ञानसम्पन्न बनाकर लोगों के अज्ञान की शान्ति के लिए मुझे पृथिवी में भेजा । भगवान्‌ ब्रह्मा ने इस लोक में जैसे मुझे भेजा वैसे ही सनक, सनन्दन, सनत्कुमार, नारद आदि अनेक अन्यान्य महर्षियों को अधिकार के अनुसार पुण्य कर्मकाण्ड के उपदेश और ज्ञानकाण्ड के उपदेश द्वारा मन और अज्ञान रूपी महाव्याधि के वशीभूत लोगों का उद्धार करने के लिए भेजा। प्राचीन काल में सत्ययुग के बीतने पर कालक्रम से पृथ्वी पर वैदिक या राग, लोभ आदि से अनुपहत कर्मकाण्ड का हास होने पर कर्मकाण्ड के संचालन और मर्यादा के रक्षण के लिए पृथक्‌ पृथक्‌ देशों का विभाग कर राजाओं की कल्पना की गई। पृथिवी में राजाओं की कल्पना होने पर राजाओं ओर प्रजा ओं के धर्म का नियन्त्रण करने में समर्थ स्मृतिशास्त्र और यज्ञ की विधि के प्रतिपादक श्रोतसूत्र ओर गृह्यसूत्र तथा श्रोतगृह्यप्रयोगों का धर्म, अर्थ और काम की सिद्धि के लिए निर्माण किया गया। इस कालचक्र के परिवर्तित होने पर फिर कर्मकाण्डक्रम नष्टभ्रष्ट हो गया, प्रतिदिन लोग भोजनमात्रपरायण और विषयों के अर्जन में तत्पर हो गये। ऐसी अवस्थामें राजाओं के देश या भोग्यपदार्थो के लिए परस्पर युद्ध होने लगे, इस प्रकार पृथ्वी में अनेक प्राणियों को दण्ड भोगना पड़ा (५४५) । पहले युद्ध के बिना ही पृथ्वी के पालनमें समर्थ होते हुए भी तदनन्तर राजा युद्ध के बिना पृथिवीपर शासन करने के लिए समर्थ नहीं हुए, इसका फल यह हुआ कि प्रजा ओं के साथ राजा दीनता को प्राप्त हो गये। भाव यह कि देह में आत्मत्त्वबुद्धि से युद्ध आदि मेँ देह का नाश होने पर आत्मा का नाश हो जायेगा, इस भय सेवे दीनता को प्राप्त हो गये। तदनन्तर उन लोगों की दीनता को दूर करने के लिए ओर आत्मज्ञान के प्रचार के लिए हम लोगों ने ज्ञानवर्धक बड़े-बड़े दर्शनों का उपदेश किया । इस अध्यात्म विद्या का पहले राजाओं मेँ उपदेश हुआ तदनन्तर इसका और लोगों मे प्रसार हुआ, इस कारण श्रीवेदव्यास आदि ने इसको राजविद्या कहा है । हे राघव, राजा लोग राजविद्या, राजगुह्य आदि नामों से प्रसिद्ध उत्तम अध्यात्मज्ञान को जानकर अत्यन्त आनन्द को प्राप्त हुए, तदनन्तर उनमें किंचित्‌ भी दुःख नहीं रहा । कालक्रम से निर्मलकीर्तिवाले अनेक राजाओं के कीर्तिशेष होने पर इन महाराज श्रीदशरथजी से आप श्रीरामचन्द्र इस पृथिवी में उत्पन्न हुए हैं