Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 11, Verses 51–55
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 11, verses 51–55 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 11 · श्लोक 51-55
संस्कृत श्लोक
त्वमतीव गुणश्लाघी प्रच्छको रघुनन्दन ।
अहं च वक्तुं जानामि समो योगोऽयमावयों ॥ ५१ ॥
यदहं वच्मि तद्यत्नात्त्वया शब्दार्थकोविद ।
एतद्वस्त्विति निर्णीय हृदि कार्यमखण्डितम् ॥ ५२ ॥
महानसि विरक्तोऽसि तत्त्वज्ञोऽसि जनस्थितौ ।
त्वयि चोक्तं लगत्यन्तः कुङ्कुमाम्बु यथांशुके ॥ ५३ ॥
उक्तावधानपरमा परमार्थविवेचिनी ।
विशत्यर्थं तव प्रज्ञा जलमध्यमिवार्कभाः ॥ ५४ ॥
यद्यद्वच्मि तदादेयं हृदि कार्य प्रयत्नतः ।
नोचेत्प्रष्टव्य एवाहं न त्वयेह निरर्थकम् ॥ ५५ ॥
हिन्दी अर्थ
हे रघुनन्दन, आप अत्यन्त श्रेष्ठ प्रश्नकर्ता है ओर मैं उपदेश
देना जानता हूँ, इसलिए हमारा यह समागम सदुश है । हे शब्दार्थ के ज्ञाता श्रीरामजी, जिस
पदार्थ का मैं उपदेश देता हूँ उसको आप “यह तत्त्व वस्तु है” ऐसा निश्चय कर प्रयत्नपूर्वक
अपने हृदय में ज्यों-का- त्यों पूर्णरूप से धारण कीजिए । हे श्रीरामचन्द्रजी, आप कुल, दया,
दाक्षिण्य आदि गुणों और सदाचार आदि से महान् हैं, विरक्त हैँ एवं तत्त्वज्ञ हैं, मुझसे जो कहा
जायेगा वह जैसे वस्त्र मेँ घोला हुआ रंग बैठ जाता है वैसे आपके हृदय के अन्तस्तर में बैठ
जायेगा । आपकी उक्त पदार्थ के ग्रहण में निपुण मेघा हे ओर परम तत्त्व का विचार करनेवाली
प्रतिभा भी हे । मेघा और प्रतिभा से सम्पन्न आपकी प्रज्ञा जैसे सूर्य की किरणें जल के अन्दर
प्रवेश कर जाती हैं, वैसे ही प्रतिपाद्य अर्थ (तत्त्वज्ञान) में प्रवेश करती है । मैं जो कुछ कहूँ, उसे
आप ग्रहण कीजिए और प्रयत्नपूर्वक उसे अपने हृदयमें स्थान दीजिए यदि एेसा आप न कर
सकें, तो आपको मुझसे पूछना ही नहीं चाहिए, क्योकि ऐसा पूछना निरर्थक है