Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 11, Verses 68–72
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 11, verses 68–72 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 11 · श्लोक 68-72
संस्कृत श्लोक
एतदेवास्य मौर्यस्य परमं विद्धि नाशनम् ।
यदिदं प्रेक्ष्यते शास्त्रं किंचित्संस्कृतया धिया ॥ ६८ ॥
संसारविषवृक्षोऽयमेकमास्पदमापदाम् ।
अज्ञं संमोहयेन्नित्यं मौर्ख्य यत्नेन नाशयेत् ॥ ६९ ॥
दुराशासर्पगत्येन मौर्ख्येण हृदि वल्गता ।
चेतः संकोचमायाति चर्माग्नाविव योजितम् ॥ ७० ॥
प्राज्ञे यथार्थभूतेयं वस्तुदृष्टिः प्रसीदति ।
दृगिवेन्दौ निरम्भोदे सकलामलमण्डले ॥ ७१ ॥
पूर्यापविचारार्थश्चास्त्वातुर्यशालिनी ।
सविकासा मतिर्यस्य स पुमानिह कथ्यते ॥ ७२ ॥
हिन्दी अर्थ
प्रज्ञा की अभिवृद्धि में शास्त्राभ्यास ही उपाय है, इस अभिप्राय से कहते हैं।
संस्कृत (विशुद्ध) बुद्धि से जो कुछ शास्त्र का अवलोकन, चिन्तन आदि किया जाता है,
उसीको इस मूर्खता के विनाश का हेतु समझो । यह संसाररूपी विषवृक्ष आपत्तियों का एकमात्र
घर है यह अज्ञानी पुरुष को सदा मोह में डालता है, इसलिए अज्ञान का यत्न से विनाश करना
चाहिए। दुराशा से साँप की-सी कुटिल गति को धारण करनेवाली हृदय में हजारों विक्षेपरूप
से व्याप्त मूर्खता से बुद्धि अग्नि में रक्खे हुए चमड़े की भाँति संकोच को प्राप्त होती है अर्थात्
संकुचित कमल की नाई मलिनता को प्राप्त होती है । जैसे मेघरहित और सम्पूर्ण निर्मल
मण्डलवाले चन्द्रमा में दृष्टि प्रसन्नता को प्राप्त होती है वैसे ही यह पूर्वोक्त वस्तुदुष्टि (वस्तु
यानी परमार्थरूप तत्त्व जिससे देखा जाता है) अर्थात् सूक्ष्मबुद्धि प्राज्ञ में, यथार्थवस्तु की
एकरसता को प्राप्त होकर प्रसन्नता को प्राप्त होती है । जिसकी पूर्वापर के विचार से ओर
अतिसूक्ष्म अर्थ के ग्रहण में अत्यन्त पटु तथा चतुरता से शोभित बुद्धि विकासयुक्त हो, इस
लोक में वही “पुरुष' कहा जाता है