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Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 11, Verses 45–49

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 11, verses 45–49 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 11 · श्लोक 45-49

संस्कृत श्लोक

अतत्त्वज्ञमनादेयवचनं वाग्विदां वर । यः पृच्छति नरं तस्मान्नास्ति मूढतरोऽपरः ॥ ४५ ॥ प्रामाणिकस्य तज्ज्ञस्य वक्तुः पृष्टस्य यत्नतः । नानुतिष्ठति यो वाक्य नान्यस्तस्मान्नराधमः ॥ ४६ ॥ अज्ञतातज्ज्ञते पूर्व वक्तुर्निर्णीय कार्यतः । यः करति नरः प्रश्नं प्रच्छकः स महामतिः ॥ ४७ ॥ अनिर्णीय प्रवक्तारं बालः प्रश्नं करोति यः । अधम प्रच्छकः स स्यान्न महार्थस्य भाजनम् ॥ ४८ ॥ पूर्वापरसमाधानक्षमबुद्धावनिन्दिते । पृष्टं प्राज्ञेन वक्तव्यं नाधमे पशुधर्मिणि ॥ ४९ ॥

हिन्दी अर्थ

हे वक्‍ताओं में श्रेष्ठ श्रीरामजी, जो पुरुष ततत्ववस्तु को नहीं जानता अतएव जिसका वचन ग्राह्य नहीं है, ऐसे पुरुष से जो प्रश्न करता है, उससे बढ़कर मूर्ख दूसरा कोई नहीं हे । पूछे गये तत्त्वज्ञ प्रामाणिक वक्ता के उपदेश का जो प्रयत्न से आचरण नहीं करता, उससे बढ़कर नराधम दूसरा नहीं हे । व्यवहार से वक्ता की अज्ञता ओर तत्त्वज्ञाता का पहले निर्णय कर जो पुरुष प्रश्न करता है, वह प्रश्नकर्ता महामति हे । जो मूर्ख (परीक्षा द्वारा) प्रकृष्ट वक्ता का निर्णय किये बिना प्रश्न करता है, वह अधम प्रश्रकर्ता हे ओर वह आत्मज्ञानरूप महान्‌ अर्थ का पात्र नहीं हो सकता अर्थात्‌ उसे कभी तत्वज्ञान प्राप्त नहीं हो सकता । प्राज्ञ पुरुष को चाहिए कि उक्त ओर अनुक्त का विवेचन कर निश्चय करने में जिसकी बुद्धि समर्थ हो ओर जो निन्दनीय न हो ऐसे पुरुष के लिए पृष्ट वस्तु का उपदेश दे पशु के जाड्य आदि धर्मो से युक्त अधम को कभी तत्त्व का उपदेश न दे