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Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 11, Verses 1–2

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 11, verses 1–2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 11 · श्लोक 1,2

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । एतत्ते कथितं सर्व ज्ञानावतरणं भुवि । मया स्वमीहितं चेव कमलोद्भवचेष्टितम् ॥ १ ॥ तदिदं परमं ज्ञानं श्रोतुमद्य तवानघ । भृशमुत्कण्ठितं चेतो महतः सुकृतोदयात् ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे पुण्यचरित, ज्ञान का पृथिवी पर अवतरण, अपने जन्म, ज्ञानावरोध, पुनः ज्ञान प्राति आदि ओर श्री ब्रह्माजी का कार्य यह सब मैं आपसे कह चुका हूँ। अब आपका चित्त महान्‌ पुण्य के उदय से उस ज्ञान के सुनने के लिए अति उत्कण्ठित हो रहा होगा

सर्ग सन्दर्भ

ढसवाँ सर्ग समाप्त ग्यारहवाँ सर्गं ज्ञानप्राप्ति का विस्तार, श्रीरामचन्द्रजी के वैराग्य की स्तुति ओर वक्ता तथा प्रश्नकर्ता के लक्षण आदि का प्रधानतः वर्णन |