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Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 11, Verses 25–30

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 11, verses 25–30 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 11 · श्लोक 25-29

संस्कृत श्लोक

स्वविवेकचमत्कारपरामर्शविरक्तया । राजते हि धिया जन्तुर्युवेव वरमालया ॥ २५ ॥ परामृश्य विवेकेनसंसाररचनामिमाम् । वैराग्यं येऽधिगच्छन्ति त एव पुरुषोत्तमाः ॥ २६ ॥ स्वविवेकवशादेव विचार्येदं पुनःपुनः । इन्द्रजालं परित्याज्यं सबाह्याभ्यन्तरं बलात् ॥ २७ ॥ श्मशानमापद दैन्यं दृष्ट्वा को न विरज्यते । तद्वैराग्यं परं श्रेयः स्वतो यदभिजायते ॥ २८ ॥ अकृत्रिमविरागत्वं महत्त्वमलमागतः । योग्योऽसि ज्ञानसारस्य बीजस्येव मृदुस्थलम् ॥ २९ ॥ प्रसादात्परमेशस्य नाथस्य परमात्मनः । त्वादृशस्य शुभा बुद्धिर्विवेकमनुधावति ॥ ३० ॥

हिन्दी अर्थ

हे परन्तप, केवल अपने विवेक से उत्पन्न तत्त्वपदार्थ के प्रति अभिमुखता से अन्य विषयों से विरक्त बुद्धि से युक्त पुरुष वैसा शोभित होता है जैसे कि वरमाला से युवा पुरुष शोभित होता है । विवेक से इस संसार रचना की दुःखरूपता का विचार कर जो लोग वैराग्य को प्राप्त होते हैं, वे ही श्रेष्ठ पुरूष हैं । अपने विलक्षण विवेकसे ही इस इन्द्रजालतुल्य प्रपंच का पुनः पुनः विचार कर हदपूर्वक इस मायिक बाह्य जगत्‌ के साथ देह, इन्द्रिय, प्राण, मन, बुद्धि ओर अविद्या का परित्याग करना चाहिए । श्मशानभूमि, आपत्तियों ओर दीनता को देखकर किसे वैराग्य न होगा ? वही वैराग्य परम श्रेयका साधन है, जो स्वतः ५ अथवा मूलस्थित रन्द्र शब्द का अर्थ शीतोष्ण आदि द्रन्द्र करना चाहिए | उनके परिहार में उपायभूत विषयों के सम्पादन के लिए प्राणी राजाओं के दण्डनीय हुए, कारण कि विषयों की सिद्धि धनमूलक है ओर धन के लिए राजाओं ने प्रजा पर कर लगाया | ति) रजोगुण का कार्य दृष्ट दुःख के अनुभव से होता है अतएव राजस कहलाता है । > केवल विवेकमात्र से उत्पन्न हुआ है अतएव सात्विक है । उत्पन्न होता है । जैसे खूब जोता गया अतएव कोमल हुआ खेत बीज बोने के योग्य होता है वैसे ही स्वाभाविक वैराग्यरूपी अत्यन्त महत्त्व को प्राप्त हुए आप आत्मज्ञान के उपदेश के योग्य पात्र है