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Vairagya Prakarana (Dispassion) · Sarga 9

13 verse-groups

  1. Verses 1–2नौवाँ सर्ग राजा के निषेध करने पर श्रीविश्वामित्रजी का क्रुद्ध होना और श्रीवसिष्ठजी का श्र…
  2. Verses 3–4राघवों के कुल की यह मर्यादा नहीं है अर्थात्‌ इस प्रकार की झूठी प्रतिज्ञा करना या मिथ्या ब…
  3. Verse 5वाल्मीकि ने कहा : उस महान्‌ तपस्वी विश्वामित्र के क्रोधित होने पर सारी पृथ्वी कोपने लगी।…
  4. Verse 6(पथिवी अपने मन में यह सोचकर भय के मारे कोपने लगी कि दशरथ मेरे स्वामी हैं, उन्होने अपनी प्…
  5. Verses 7–8वसिष्ठजी ने कहा : हे राजन्‌, तुम इक्ष्वाकु वंश में साक्षात्‌ दूसरे धर्म के सदृश उत्पन्न ह…
  6. Verses 9–10तुम्हारे कुल में उत्पन्न हुए पहले के राजाओं ने प्रतिज्ञापालन आदि धर्मो का कितनी दृढ़ता के…
  7. Verse 11लोक में यह प्रसिद्ध है कि जैसे राजा भले-बुरे आचरण करते हैं, वैसे ही उनकी प्रजा भी आचरण कर…
  8. Verse 12तुम्हारे जैसे विशिष्ट व्यक्तियों द्वारा चलाये गये व्यवहार से (नियम से) साधारण अज्ञानी भी…
  9. Verse 13इन्द्र के साथ में रक्खा हुआ अमृत अग्नि द्वारा चारों ओर रक्षित होने के कारण जैसे उसकी राक्…
  10. Verse 14राजा के प्रति स्वयं कथित अर्थ की पुष्टि करने के लिए विश्वामित्र के लोकोत्तर प्रभाव का महर…
  11. Verses 15–16चराचर तीनों लोको में यह प्रसिद्धि है कि विविध अस्त्रविद्या में ये इतने निपुण हैं कि इस सम…
  12. Verses 17–18विश्वामित्र जब राज्य करते थे, तब उनकी उग्र तपश्चर्या से सन्तुष्ट होकर रुद्र ने कृशाश्व द्…
  13. Verses 19–23उनमें प्रधान अस्त्रो को कहते हैं। दक्ष प्रजापति की जया ओर सुप्रभा नामकी दो अत्यन्त सुन्दर…