Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 9, Verses 17–18
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 9, verses 17–18 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 9 · श्लोक 17,18
संस्कृत श्लोक
अस्त्रमस्मै कृशाश्वेन परैः परमदुर्जयम् ।
कौशिकाय पुरा दत्तं यदा राज्यं समन्वगात् ॥ १७ ॥
ते हि पुत्राः कृशाश्वस्य प्रजापतिसुतोपमाः ।
एनमन्वचरन्वीरा दीप्तिमन्तो महौजसः ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
विश्वामित्र
जब राज्य करते थे, तब उनकी उग्र तपश्चर्या से सन्तुष्ट होकर रुद्र ने कृशाश्व द्वारा प्रसूत अस्त्र उन्हें
दिये । प्रजापति के पुत्र रुद्र के समान संहार करने में वीर, दीप्तिमान् और शत्रुओं का निर्दलन करने में
समर्थ वे कृशाश्व द्वारा प्रसूत अस्त्र (अस्त्ररूपी देव) विश्वामित्र को प्राप्त होकर अनुचर के समान उनकी
सेवा करते हैं