Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 9, Verses 15–16
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 9, verses 15–16 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 9 · श्लोक 15, 16
संस्कृत श्लोक
एषोऽस्त्रं विविधं वेत्ति त्रैलोक्ये सचराचरे ।
नैतदन्यः पुमान्वेत्ति न च वेत्स्यति कश्चन ॥ १५ ॥
न देवा नर्षयः केचिन्नासुरा न च राक्षसाः ।
न नागा यक्षगन्धर्वाः समेताः सदृशा मुनेः ॥ १६ ॥
हिन्दी अर्थ
चराचर तीनों लोको में यह प्रसिद्धि
है कि विविध अस्त्रविद्या में ये इतने निपुण हैं कि इस समय इनकी बराबरी करनेवाला दूसरा कोई नहीं है
और न भविष्य में भी कोई होगा । महर्षि विश्वामित्र की समानता न सम्पूर्ण देवता कर सकते हैं, न अन्य
ऋषि कर सकते हैं और न असुर, राक्षस, नाग, यक्ष ओर गन्धर्व ही कर सकते हैं