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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 9, Verse 13

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 9, verse 13 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 9 · श्लोक 13

संस्कृत श्लोक

गुप्तं पुरुषसिंहेन ज्वलनेनामृतं यथा । कृतास्त्रमकृतास्त्रं वा नैनं शक्ष्यन्ति राक्षसाः ॥ १३ ॥

हिन्दी अर्थ

इन्द्र के साथ में रक्खा हुआ अमृत अग्नि द्वारा चारों ओर रक्षित होने के कारण जैसे उसकी राक्षस लोग कुछ भी हानि नहीं कर सकते, वैसे ही पुरुषों में सिंह के समान अर्थात्‌ पुरुषों में श्रेष्ठ श्रीविश्वामित्र द्वारा रक्षित होने पर, फिर चाहे अस्त्रविद्या में निपुण हों, चाहे न हो, श्रीरामचन्द्रजी को राक्षस लोग कुछ भी हानि नहीं पहुँचा सकेंगे