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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 9, Verses 19–23

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 9, verses 19–23 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 9 · श्लोक 19-23

संस्कृत श्लोक

जया च सुप्रभा चैव दाक्षायण्यौ सुमध्यमे । तयोस्तु यान्यपत्यानि शतं परमदुर्जयम् ॥ १९ ॥ पञ्चाशतं सुताञ्जज्ञे जया लब्धवरा पुरा । वधार्थं सुरसैन्यानां ते क्षमाः कामचारिणः ॥ २० ॥ सुप्रभा जनयामास पुत्रान्पञ्चाशतं परान् । संघर्षान्नाम दुर्धर्षान्दुराकारान्वलीयसः ॥ २१ ॥ एवंवीर्यो महातेजा विश्वामित्रो जगन्मुनिः । न रामगमने बुद्धिं विक्लवां कर्तुमर्हसि ॥ २२ ॥ अस्मिन्महासत्त्वतमे मुनीन्द्रे स्थिते समीपे पुरूषस्य साधो । प्राप्तेऽपि मृत्यावमरत्वमेति मा दीनतां गच्छ यथा विमूढः ॥ २३ ॥

हिन्दी अर्थ

उनमें प्रधान अस्त्रो को कहते हैं। दक्ष प्रजापति की जया ओर सुप्रभा नामकी दो अत्यन्त सुन्दर कन्याएँ थीं । उनके गर्भ से बड़े पराक्रमी ओर शत्रुओं द्वारा दुर्जय सौ पुत्र उत्पन्न हुए । उनमें जया ने पतिसेवा से वर पाकर देवसेना असुरो का वध करने में समर्थ हो, इसलिए यथेष्ट विहार करनेवाले पचास पुत्र अपने गर्भ से उत्पन्न किये ओर सुप्रभा ने शत्रुओं का दिल दहलानेवाले दुर्घर्षं ओर भयंकर आकारवाले अत्यन्त बली संघर्षनाम के अन्य पचास पुत्र उत्पन्न किये । राजन्‌, इस प्रकार के पराक्रमवाले महातेजस्वी ओर सारे जगत्‌ को अपने योग के प्रभाव से हस्तामलकवत्‌ देखनेवाले ये महानुभाव महर्षि विश्वामित्र हैं, अत: रामचन्द्रजी के इनके साथ जाने में तुम्हें मन में किसी प्रकार की व्याकुलता नहीं करनी चाहिए । क्योकि हे साधो, महाप्रभावशाली ये मुनीन्द्र जिस पुरुष की सन्निधि में हो उसकी यदि मृत्यु भी प्राप्त हो, तो भी वह अमरभाव को प्राप्त हो जाता है, इसलिए तुम मूर्ख मनुष्य की नाई दीन मत बनो