Vairagya Prakarana (Dispassion) · Sarga 15
चौढहवाँ सर्ग समाप्त पन्द्रहवाँ सर्ग सब अनर्थ और ममता के मूल स्तम्भ अहंकार की निन्दा |
18 verse-groups
- Verse 1इसी प्रकार अहंकार भी सुखकर नहीं है, बल्कि सम्पूर्ण दोष अभिमान से ही होते हैं, ऐसा कहते है…
- Verse 2संसार एक आकारवाला नहीं है। उसके विविध प्रकार हैँ । साध्य, साधन, फल, प्रवृत्ति-ये सभी संसा…
- Verse 3अहंकार से ही विविध आपत्तियाँ- (शारीरिक कष्ट) होती हैं, अहंकार से ही अनेक भीषण मानसिक क्ले…
- Verse 4वैरी उक्त अहंकार का अवलम्बन करके न तो मैं भोजन करता हूँ और न जल पीता हूँ। विविध भोगों के…
- Verse 5जैसे बहेलिया वागुरा को (मृगों को बाँधने का फन्दा अर्थात् जाल को) बिछाकर मृगों को पकड़ता…
- Verse 6जैसे पर्वत से खैर के वृक्षों की उत्पत्ति होती है, वैसे ही संसार में जितने चिरकाल स्थायी भ…
- Verse 7अहंकार शमरूपी चन्द्रमा को निगलने के लिए राहूका मुँह है, गुणरूपी कमलों का विनाश करने के लि…
- Verse 8अहंकार का त्याग करने पर देहाभिमान, ममता आदि दोष स्वयं ही शन्त हो जाते हैं, ऐसा दशति हैं ।…
- Verse 9“निन्द्रेष्यपि गुणो ग्रह्म: इस न्याय से बुद्ध का उदाहरण दिया है या जितः“ ऐसा पाठ समझना चा…
- Verse 10ब्रह्मन्, यदि अहंकार रहता है, तो आपत्ति में मुझे दुख होता है और अहंकार नहीं रहता, तो मैं…
- Verse 11भोगसम्पत्ति से ही उद्बेगहीनता आदि क्यो नहीं होते इस शंका पर कहते हैं। मुनिवर, मैं अहंकार…
- Verses 12–14ब्रह्मन्, जब तक अहंकाररूपी मेघ उमड़ता रहता है तब तक तृष्णारूपी कुटज के फूल खूब खिलते रहत…
- Verse 15इस देहरूपी महाअरण्यमें उन-उन हेतुओंसे वृद्धि को प्राप्त यह निविड़ अहंकाररूपी मत्त सिंह नि…
- Verse 16जैसे लम्पट पुरुष मोतियों की माला गूंथ कर गले में पहने रहते हैं, वैसे ही अहंकार ने भी तृष्…
- Verse 17महामुने, इस अहंकाररूपी परम शत्रु ने ही इस संसार में मन्त्र-तन्त्र से शून्य पुत्र, मित्र,…
- Verses 18–19प्रबल शत्रु अहंकार का मूलोच्छेदपूर्वक निरास करने पर ये सभी मानसिक कष्ट बड़ी जल्दी अपने आप…
- Verse 20हे ब्रह्मन्, में निरहंकार होकर भी मूर्खतावश शोक से दुःखी हो रहा हूँ इसलिए मेरी प्रार्थना…
- Verse 21इस प्रकार अहंकार, उससे होनेवाले अनर्थ और उसके उच्छेद के फल का वर्णन कर अहंकार के त्याग से…