Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 15, Verses 12–14
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 15, verses 12–14 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 15 · श्लोक 12-14
संस्कृत श्लोक
ब्रह्मन्यावदहंकारवारिदः परिजृम्भते ।
तावद्विकासमायाति तृष्णाकुटजमञ्जरी ॥ १२ ॥
अहंकारघने शान्ते तृष्णा नवतडिल्लता ।
शान्तदीपशिखावृत्त्या क्वापि यात्यतिसत्वरम् ॥ १३ ॥
अहंकारमहाविन्ध्ये मनोमत्तमहागजः ।
विस्फूर्जति घनास्फोटैः स्तनितैरिव वारिदः ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
ब्रह्मन्, जब तक अहंकाररूपी मेघ उमड़ता रहता है तब तक तृष्णारूपी
कुटज के फूल खूब खिलते रहते हैं और अहंकार रूपी मेघ के शान्त होने पर तृष्णा बिजली की लकीर
के तुल्य, बुझी हुई दीपशिखा (दीपक की लो) की तरह, बड़ी शीघ्रता से कहीं विलीन हो जाती है। जैसे
मेघ गड़गड़ाहट के साथ गर्जता है वैसे ही अहंकाररूपी विशाल विन्ध्याचल में मन रूपी मत्त गजेन्द्र
युद्धोत्साह के साथ या निविड़ शिलाओं के टूटने की ध्वनि के साथ गर्जता है