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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 15, Verses 18–19

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 15, verses 18–19 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 15 · श्लोक 18,19

संस्कृत श्लोक

प्रमार्जितेऽहमित्यस्मिन्पदे स्वयमपि द्रुतम् । प्रमार्जिता भवन्त्येते सर्व एव दुराधयः ॥ १८ ॥ अहमित्यम्बुदे शान्ते शनैश्च शमशातिनी । मनोगगनसंमोहमिहिका क्वापि गच्छति ॥ १९ ॥

हिन्दी अर्थ

प्रबल शत्रु अहंकार का मूलोच्छेदपूर्वक निरास करने पर ये सभी मानसिक कष्ट बड़ी जल्दी अपने आप विलीन हो जाते हैं, थोड़ी-थोड़ी करके हो या तीव्र वेग से हो, हृदयाकाश में स्थित अहंकार रूपी मेघ के शान्त होने पर शान्ति का विनाश करनेवाला महामोह रूपी कुहरा न मालुम कहाँ विलीन हो जाता है