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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 15, Verse 8

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 15, verse 8 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 15 · श्लोक 8

संस्कृत श्लोक

नाहं रामो न मे वाञ्छा भावेषु न च मे मनः । शान्त आसितुमिच्छामि स्वात्मनीव जिनो यथा ॥ ८ ॥

हिन्दी अर्थ

अहंकार का त्याग करने पर देहाभिमान, ममता आदि दोष स्वयं ही शन्त हो जाते हैं, ऐसा दशति हैं । न मैं रामचन्द्र हूँ, न मुझे विषयों की अभिलाषा है और न मेरा मन ही है मैं निर्वैर होकर बुद्ध के समान अपनी आत्मा में स्थित रहना चाहता हूँ। जैसे बुद्ध किसीको किसी प्रकार की पीड़ा नहीं पहुँचाते थे वैसे ही में भी किसी को किसी प्रकार की पीड़ा न पहुँचा कर आत्माराम होना चाहता हूँ