Guru's AddaGuru's Adda

Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 69

29 verse-groups

  1. Verse 1अप्रबुद्ध को (अज्ञानी को) ही यह जगत्‌ की भ्रान्ति सत्यस्वरूपता को प्राप्त है । हे श्रीराम…
  2. Verse 2पर्वत, नदियाँ, झरने तथा लोकलोकान्तर आदि के जितने भ्रम हैं वे सब उसी ब्रह्म में दीख पड़ते…
  3. Verse 3श्रीरामजी, तदनन्तर अबाध गतिवाली वह विद्याधरी उस शिला के पेट में स्थित जगत्‌ में प्रविष्ट…
  4. Verses 4–8हे श्रीरामजी, तदनन्तर उद्यमशील तथा परम शोभावाली वह विद्याधरी वहाँके ब्रह्मलोक में जाकर ब्…
  5. Verse 9हे मुनीश्वर, इसलिए मुझे ओर इन्हें भी बोध देकर उस परब्रह्म के मार्ग में लगाने की कृपा कीजि…
  6. Verses 10–11हे श्रीरामजी, उस विद्याधरी ने मुझसे वैसा कहकर फिर उस ब्रह्माजी को जगाने के लिए कहने लगी :…
  7. Verse 12हे स्वामिन्‌, आप यह जानिये कि ये मुनिश्रेष्ठ पूज्य हैं, इसलिए अर्घ्य, पाद्य आदि से इनकी प…
  8. Verse 13महामेधावी वह मुनि समाधि से समुद्र मे आवर्त के समान उठे, वे अपनी आत्मा को पहचानने के निमित…
  9. Verse 14तदनन्तर धीरे से उस नीतिज्ञ विद्वान ने अपने नेत्र उस तरह खोले, जैसे मधुमास (वसन्त) शिशिर म…
  10. Verse 15बाद में धीरे-धीरे उसके वे समस्त हाथ, पैर आदि अंग-अपने-अपने ज्ञान को ऐसे प्रकट करने लगे या…
  11. Verse 16अनन्तर, देव, सिद्ध ओर अप्सराएँ चारों तरफ से ऐसे आ धमकी, जैसे प्रातःकाल में खिले हुए कमलो…
  12. Verse 17श्रीरामजी, उस ब्रह्मा ने सामने उपस्थित हमको ओर विलासिनी उस रमणी को देखा। देखने के बाद उन्…
  13. Verse 18शिलोदर जगत्‌ के ब्रह्माजी ने कहा : हे हाथ में ओंवले के सदुश असार संसार के तत्त्व को जानने…
  14. Verse 19हे मुने, आप इस अतिदूरातिदूरवर्ती स्थान में पधारे है, अतः लम्बे मार्ग के कारण खूब थक गये ह…
  15. Verse 20श्रीरामजी, उस जगत्‌ के ब्रह्माजी के वैसा कहने पर हे भगवन्‌, आपका अभिवादन करता हूँ” यों कह…
  16. Verse 21अनन्तर देवता, ऋषि, गन्धर्व, मुनि, विद्याधर आदि द्वारा गायी गई उनकी स्तुतिर्या आरम्भ हुई,…
  17. Verse 22अनन्तर एक मुहूर्तमात्र में देव, गन्धर्व आदि भूतगणो के द्वारा वाणी से किया गया प्रणाम समार…
  18. Verse 23हे भूतभव्य के स्वामिन्‌, यह विद्याधरी यत्नपूर्वक मेरे पास आकर कहती है कि तुम हम लोगों को…
  19. Verse 24हे देव, आप सब प्राणियों के स्वामी हैं समस्त ज्ञानं के पारंगत हैं, अत: यह काममुग्धा स्त्री…
  20. Verse 25हे देव, आपने अपनी भार्या बनाने के निमित्त इसे क्यों उत्पन्न किया ? उत्पन्न करके क्यों अपन…
  21. Verse 26आपका आशय ठीक है कि यद्यपि मँ और यह दोनों उपदेश के लिए योग्य नहीं है, तथापि इसने अपनी ही व…
  22. Verse 27सबसे पहले उयोद्धातसगरति से अग्रतिहत ज्ञान, वैरग्य, ऐश्वर्य और धर्म-ये वायो जगदीश्वर के सा…
  23. Verse 28उक्त तत्त्वज्ञान से बाधित अपनी उत्पत्ति ऑर अपना नाम आपके लिए केसे सिद्ध हो सकता है, इस पर…
  24. Verse 29तात्त्विक दृष्टि से तो न मैं उत्पन्न हुआ हूँ और न कुछ देखता ही हूँ । सभी प्रकार के आवरणों…
  25. Verse 30तब हम दोनों तत््वज्ञानियों का परस्पर जो ग्रश्नोत्तरादि व्यवहार हो रहा है, वह कैसा है, इस…
  26. Verses 31–33भद्र, इस प्रकार समुद्र से जनित तरंगों के सदृश थोड़ी मात्रा मे कल्पित अपनी और दूसरे की दृष…
  27. Verse 34हे वसिष्ठजी, उक्त विशुद्धस्वरूप मुझको पूर्वपूर्व के अहंकार के संस्कार से उत्पन्न स्मृति-…
  28. Verse 35भद्र, यह वासना की अधिष्ठात्री देवी ही बैठी है, न तो यह मेरी गृहिणी है और न गृहिणी के निमि…
  29. Verse 36तब यह आपको अपना पति क्यों कहती है इसपर कहते हैं / चूँकि यही भीतर की समस्त जगत्‌ की वासना…