Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 69, Verses 4–8
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 69, verses 4–8 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 69 · श्लोक 4-8
संस्कृत श्लोक
यावत्सा तत्र वैरिञ्चं लोकमासाद्य सोद्यमा ।
उपविष्टा विरिञ्चस्य पुरः परमशोभना ॥ ४ ॥
वक्त्ययं मुनिशार्दूल पतिर्मे पाति मामिमाम् ।
विवाहार्थमनेनाहं जनिता मनसा पुरा ॥ ५ ॥
पुराणः पुरुषोऽप्येष मामप्यद्य जरागताम् ।
न विवाहितवांस्तेन विरागमहमागता ॥ ६ ॥
विरागमेषोऽप्यायातो गन्तुमिच्छति तत्पदम् ।
यत्र न द्रष्टता नैव दृश्यता न तु शून्यता ॥ ७ ॥
महाप्रलय आसन्नो जगत्यस्मिंश्च संप्रति ।
ध्यानान्न च चलत्येषु शैलमौनादिवाचलः ॥ ८ ॥
हिन्दी अर्थ
हे श्रीरामजी, तदनन्तर उद्यमशील तथा परम शोभावाली वह विद्याधरी
वहाँके ब्रह्मलोक में जाकर ब्रह्माजी के सम्मुख बैठ गई और बैठकर मुझसे कहने लगी - हे मुनिश्रेष्ठ,
ये मेरे पति हैं, ये मेरी रक्षा करते हैं, विवाह के लिए इन्होंने ही मनसे मेरा उत्पादन किया था, यद्यपि
अब ये पुरुष बूढ़े हो गये हैं और मैं भी बूढ़ी हो गई हूँ, तथापि आजतक मेरे साथ विवाह नहीं किया,
इसीसे अब मुञ्च वैराग्य हो गया है, इन्हें भी वैराग्य आ गया है, ये उस परम पद मेँ जाने की इच्छा
रखते हैं, जहाँ न तो कोई द्रष्टता है, न दृश्यत्व है और न शून्यत्व ही है ।' श्रीरामजी, वह विद्याधरी
जब तक यह मुझसे कह रही थी, तब तक इस जगत् में महाप्रलयकाल समीप आ रहा था । फिर
उस विद्याधरी ने कहना आरम्भ किया-भगवन्, अभी भी ये अपने ध्यान से विचलित नहीं होते,
पर्वत के सदृश अपनी मुनिवृत्ति से मानों ये अचल पर्वत ही लगते हैं