Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 69, Verses 10–11
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 69, verses 10–11 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 69 · श्लोक 10,11
संस्कृत श्लोक
इत्युक्त्वा मामसौ तस्य बोधायेदमुवाच ह ।
नाथायं मुनिनाथोऽद्य सद्म संप्राप्तवानिदम् ॥ १० ॥
एषोऽन्यस्मिञ्जगद्गेहे ब्रह्मणस्तनयो मुनिः ।
पूजयैनं गृहायातं गृहस्थगृहपूजया ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
हे श्रीरामजी, उस विद्याधरी ने मुझसे वैसा
कहकर फिर उस ब्रह्माजी को जगाने के लिए कहने लगी : हे स्वामिन्, आज अपने इस घर में ये सब
मुनियों के श्रेष्ठ महाराज वसिष्ठजी पधारे हैं, ये मुनि दूसरे जगद्रूप घर में रहनेवाले ब्रह्माजी के पुत्र
हैं । हे नाथ, गृहस्थ पुरुषों के घर मेँ होनेवाली समुचित पूजा से अपने घर पर पधारे हुए इनका
सत्कार कीजिए