Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 69, Verse 1
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 69, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 69 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
जगदङ्गमनाभासमदृश्यं दृश्यवत्स्थितम् ।
परया दृश्यते दृष्ट्या तद्ब्रह्मैव निरामयम् ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
अप्रबुद्ध को (अज्ञानी को) ही यह जगत्
की भ्रान्ति सत्यस्वरूपता को प्राप्त है । हे श्रीरामजी, मदिरा पीकर मतवाले बने हुए पुरुष को ही
सुस्थिर ये वृक्ष तथा पर्वत आदि नाचते दिखाई देते हैं ॥४ २॥ हे श्रीरामचन्द्रजी, जो लोग योगिप्रत्यक्ष
सर्वत्र अप्रतिहत, एकबोधरूप, पूर्णानन्दैकरस चित्स्वरूप का बोध करके भी बाधित हुए उस चक्षुः
आदि अन्य प्रत्यक्ष का-तुच्छ होते हुए भी प्रमाणरूप से आश्रय लेते हैं वे मूढ़ आत्मवंचक तृण के
समान नगण्य हैं, उनसे मेरा कुछ भी प्रयोजन नहीं है ॥४ ३॥
अड्सठवाँ सर्ग समाप्त
उनहत्तरवों सर्ग
शिला की सृष्टि के अन्दर प्रवेश और वहाँ के ब्रह्मा का दर्शन तथा
सत्कारपूर्वक बैठाये गये वसिष्ठमुनि से ब्रह्माजी का सम्भाषण।
शिला के पेट में जयत् की संभावनार्थ उसकी सत्ता एवं स्यति देने काले अधिष्ठानभूत ब्रह्म को
दिखलाते हैं /
महाराज वसिष्ठजी ने कहा : भद्र, जिसके समस्त जगत् एक तरह के अवयव-से हैं, ऐसे सूर्य
आदि ज्योतियों से अगम्य तथा चक्षु आदि इन्द्रियों का अविषय परब्रह्म ही दृश्य-सा बनकर स्थित
है, वह निरामय परब्रह्म समाधि की दिव्यदृष्टि से दीख पड़ता है (यह जगत् परब्रह्म की ज्योति से
ही प्रकाशित हो रहा है,अतः जगत् भी वास्तव में निर्विकार ब्रह्मस्वरूप ही है ।)