Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 40
उनतालीसर्वाँ सर्ग समाप्त चालीसवों सर्ग न तो संसारदशा में ब्रह्म का भान होता है और न ब्रह्मदशा में संसार का ही भान होता है, परन्तु जीवन्मुक्ति में क्रमशः दोनों का भान होता है, यह वर्णन ।
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- Verse 1तत्वज्ञ का यह अनुभव हैं कि स्वत स्वरूप से शून्य बाह्य ऑर आभ्यन्तर वस्तुओ का वास्तविक स्वर…
- Verse 2उसमें अन्चय-व्यतिरेकरूप युक्ति बतलाते हैं / जब अपरिच्छिन्न वस्तु (ब्रह्म) स्वभाव की स्थित…
- Verse 3अब व्यतिरेक दिखलाते हैं । जब आत्मरवरूप के ज्ञान से शान्तिरूप आत्म-विश्रान्ति अपनी स्थिति…
- Verse 4यही कारण है कि ब्रह्मस्वरूप में विश्रान्ति के विरोधी भोग आदि सबके सब अनर्थरप ही हैं; यह क…
- Verse 5ब्रह्मस्वरूप से विरुद्ध भावना करना सृष्टि है तथा स्वभावात्मक ब्रह्मरूप की प्राप्ति कल्याण…
- Verse 6हे श्रीरामचन्द्रजी, मैं अपने को यानी द्रष्टा आदि त्रिपुटी के भीतर सर्वप्रथम वसिष्ठसंज्ञक…
- Verse 7हे श्रीरामजी, “तुम वसिष्ठ हो” इस “त्वम्* शब्द के अर्थ से घटित त्वन्ता को ही (त्वम्* शब्…
- Verse 8हे श्रीरामचन्द्रजी, वायु मेँ स्पन्दन की नाई, परम चिदाकाशरूप ही ब्रह्म में ये शब्दार्थादिर…
- Verse 9द्वैत के साथ विद्वेष होने के कारण मुदे द्वैत का अवन हैं, ऐसी कई बात नहीं हैं, किन्तु द्रे…
- Verse 10जिसका कभी दर्शन नहीं होता, ऐसे पदार्थ के विषय में उपदेश की ग्रप्निद्धि कैसे 2 इस शंका पर…
- Verse 11वह भी उत्तरोत्तर श्रूगिकाओं में क्रमश: द्वैत करे अवर्शन से आगे चलकर बिलकुल प्रशान्त हो जा…
- Verse 12जीवन्मुक्त ज्ञानी की दृष्टि से द्वैत उत्तरोत्तर निर्वल होता जाता है, यह दो दष्टान्तो से क…
- Verse 13जो भलीभाँति दिखाई दे रही जगत् की माया परमार्थसत्यरूप आत्मा में तथा अत्यन्त असद्रूप शून्य…